hypothalamus disease

पीयूष या पिट्यूटरी ग्लैंड डिसऑर्डर रोग :- पीयूष या पिट्यूटरी ग्लैंड डिसऑर्डर एक गंभीर समस्या है,जिसका अत्यंत घातक प्रभाव मानव शरीर पर पड़ता है।इस रोग में पीयूष ग्रंथि से उत्पन्न होनेवाला हार्मोन्स शरीर के वृद्धि एवं विकास के साथ शरीर में उपस्थित अन्य ग्रंथियों पर भी घातक प्रभाव डालते हैं।वास्तव में पीयूष ग्रंथि डिसऑर्डर में हार्मोन्स का स्राव बहुत अधिक या बहुत काम हो जाता है।शरीर को सुचारु रूप से चलाने के लिए हार्मोन्स का संतुलन अतिआवश्यक है।इसके स्राव का बिगड़ना एक घातक एवं तकलीफदेह साबित होकर शरीर पर बुरा प्रभाव डालता है।

लक्षण :- सिरदर्द,डिप्रेशन,उल्टी,कमजोरी,ठण्ड लगना,जोड़ों में दर्द,स्ट्रेच मार्क्स,मासिक धर्म में अनियमितता,पेशाब की मात्रा में वृद्धि,हड्डियों का कमजोर हो जाना,आँखों की रोशनी काम हो होना,वजन बढ़ना या घटना,पसीना अधिक आना,उच्च रक्तचाप,शुगर का बढ़ना,ह्रदय में परेशानी,शरीर पर बालों का अधिक उगना आदि पीयूष या पिट्यूटरी ग्लैंड डिसऑर्डर के प्रमुख लक्षण हैं।

कारण :- किसी तरह का आघात,विशेष प्रकार के दवाओं का सेवन,आंतरिक रक्तस्राव होना,पिट्यूटरी ट्यूमर आदि पीयूष या पिट्यूटरी ग्लैंड डिसऑर्डर के मुख्य कारण हैं।

पीयूष या पिट्यूटरी ग्लैंड डिसऑर्डर से होने वाली समस्याएं -

(1) ट्रॉमेटिक ब्रेन इंजुरी 

(2) हापोथायरॉइडिज्म 

(3) डायबिटीज इंडिपिड्स 

(4) हायपर प्रोलैक्टिनेमिया आदि ।

उपचार :- (1) अश्वगंधा पाउडर का सेवन प्रतिदिन सुबह- शाम करने से पीयूष ग्रंथि 

                    डिसऑर्डर दूर हो जाता हैं।

              (2) बच चूर्ण का सेवन प्रतिदिन खली पेट शहद के या देशी घी के साथ करने 

                   से पीयूष या पिट्यूटरी ग्लैंड डिसऑर्डर दूर हो जाता हैं।

              (3) ब्राह्मी,शंखपुष्पी,मालकांगनी समान भाग लेकर चूर्ण बनाकर प्रतिदिन 

                   सुबह-शाम ताजे जल के साथ सेवन करने से पीयूष ग्रंथि सम्यक रूपेण 

                   कार्य करने लगता हैं।

              













































 


cerebral aneurysm disease

मस्तिष्क धमनी विस्फार या प्रमस्तिष्कीय उत्स्फार रोग :- आज की भाग दौड़ भरी जीवन शैली में लोगों की दिनचर्या में व्यापक बदलाव के कारण मानव तनाव,अवसाद आदि कारणों से व्यथित है।परिणामस्वरूप विभिन्न प्रकार की बीमारियों से ग्रसित हैं।मस्तिष्क धमनी विस्फार उनमें एक बहुत ही गंभीर एवं जानलेवा बीमारी है।इसमें मस्तिष्क की धमनी का कोई भाग फूल जाता है और उनमें खून भर जाता है।इसे सेरिब्रल अनियरिज्म या इंट्राक्रेनियल अनियरिज्म कहा जाता है।मस्तिष्क धमनी विस्फार एक प्रकार से जानलेवा स्थिति है,जो किसी भी उम्र के लोगों को प्रभावित कर सकती है।इसमें ब्रेन स्ट्रोक या ब्रेन डैमेज के कारण मरीज की मौत भी हो जाती है।

लक्षण :- अचानक सिरदर्द,होश खोना,मितली और उल्टी,चक्कर आना,चलते हुए संतुलन खोना,गर्दन में अकड़न,धुंधला दिखना,रौशनी से संवेदनशीलता आदि मस्तिष्क धमनी विस्फार के प्रमुख लक्षण हैं। 

कारण:- उच्च रक्तचाप,एथ्रोरोसेक्लोरोसिस संक्रमण,गंभीर आघात या चोट,आनुवंशिक कारण,संयोजी ऊतकों का रोग आदि मस्तिष्क धमनी विस्फार के मुख्य लक्षण हैं। 

उपचार :- मस्तिष्क धमनी विस्फार का उपचार अत्यंत कठिन है;किन्तु धमनी विस्फार न हो इसके लिए निम्नलिखित उपचारों को अपनाकर बचा जा सकता है।

(1) अश्वगंधा पाउडर का सेवन सुबह-शाम ताजे जल या दूध के साथ करके भी मस्तिष्क धमनी विस्फार से बच सकते हैं।

(2) उच्च रक्तचाप को नियंत्रित कर हम मस्तिष्क धमनी विस्फार से बच सकते हैं ।इसके लिए प्रतिदिन सुबह-शाम नोनी जूस की मात्रा 30 एम् एल कांच या चीनी मिटटी के पात्र में डालकर और उतने ही पानी मिलाकर सेवन करने से उच्च रक्तचाप को रोका जा सकता है ।

(3) धूम्रपान न करके भी हम मस्तिष्क धमनी विस्फार से बच सकते हैं।

(4) ड्रग्स का सेवन नहीं करके हम मस्तिष्क धमनी विस्फार से बच सकते हैं ।

(5) ब्राह्मी चूर्ण का सेवन सुबह-शाम करने से भी मस्तिष्क धमनी विस्फार से बचा जा सकता है।

(6) सहजन की जड़ का काढ़ा सुबह-शाम बनाकर पीने से मस्तिष्क धमनी विस्फार से बचा जा सकता है।

(7) वाहन चलाते समय हेलमेट पहनकर सर को चोट से बचा कर भी हम मस्तिष्क धमनी विस्फार से बच सकते हैं ।


acute encephalitis syndrome disease

चमकी बुखार या एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम रोग :- चमकी बुखार एक रहस्यमय,संक्रामक एवं खतरनाक बीमारी के रूप में विख्यात है,जो मस्तिष्क की तंत्रिका तंत्र की बीमारी है।इस बीमारी में वायरस के संक्रमण हो जाने से मस्तिष्क के नर्वस सिस्टम या तंत्रिका तंत्र प्रभावित हो जाता है और मस्तिष्क की कोशिकाओं में सूजन एवं अन्य समस्या उत्पन्न हो जाती है ।फलस्वरूप शरीर के अंग कार्य करने में असमर्थ हो जाता है ।यह वास्तव में अत्यधिक गर्मी एवं नमीयुक्त मौसम में शरीर में पानी की कमी के कारण खून में शुगर एवं सोडियम की कमी हो जाने की वजह से होता है। इसे दिमागी बुखार के नाम से भी जाना जाता है ।

भारत में प्रत्येक साल मई और जून के महीने में विशेषकर बिहार प्रान्त के अलग -अलग क्षेत्रों में 1 से 15 साल की उम्र की बच्चे इस बीमारी से अत्यधिक प्रभावित होकर अपना जीवन खो देते हैं।इस बीमारी में शरीर की प्रमुख नर्वस सिस्टम या तंत्रिका तंत्र प्रभावित होती है ।अत्यधिक गर्मी एवं नमीयुक्त मौसम में एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम की फैलने की रफ़्तार अत्यधिक बढ़ जाती है ;क्योंकि गर्मियों में तेज धूप ,शरीर में पानी की कमी हो जाने एवं समय पर उचित उपचार न मिल पाने की वजह से जानलेवा साबित हो जाती है ।वास्तव में मानव मस्तिष्क में असंख्य कोशिकाएं एवं तंत्रिकाएं होती हैं ,जिनके सहारे शरीर की अंग कार्य करते हैं ।किन्तु जब इन कोशिकाओं में सूजन या अन्य दिक्क्तें आ जाती हैं तो इसे ही एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम कहते हैं ।

लक्षण :- अत्यधिक पसीना आना,तेज बुखार,शरीर में पानी की कमी,शरीर में ऐठन,डिहाइड्रेशन,लो ब्लड प्रेशर,सिरदर्द,थकान,बेहोशी,जबड़े और दानत कड़े हो जाना,लकवा,मिर्गी,भूख में कमी आदि चमकी बुखार की प्रमुख लक्षण हैं।

कारण :- वाइरस,वैक्टीरिया,फंगस,प्रोटोजोआ ,अत्यधिक गर्मी,शरीर में पानी की कमी,खून में शुगर एवं सोडियम की कमी,खली पेट लीची खाकर पानी पीना,मस्तिष्क की कोशिकाओं में सूजन आदि चमकी बुखार की मुख्य कारण हैं।

उपचार :- (1)  चीनी ,नमक का घोल ,छाछ,शिकंजी लगातार एक -एक घंटे पर पिलाने से चमकी बुखार में बहुत राहत मिलती है और प्राण 

                     रक्षा हो जाती है ।

              (2) नीम्बू और पानी में थोड़ा सा नामक एवं चीनी मिलाकर प्रति घंटे पिलाने से चमकी बुखार से शरीर में होने वाली पानी की कमी को रोककर जान की रक्षा होती है ।

              (3) एलोवेरा जूस प्रति घंटे पिलाने से भी चमकी बुखार दूर हो जाती है।


              (4) गिलोय स्वरस प्रतिदिन तीन बार पिलाने से चमकी बुखार से मुक्ति मिलती है।

              (5) मठ्ठा ,लस्सी और बेल का शरबत पिलाने से भी चमकी बुखार में राहत मिलती है ।

                    (6) नारियल पानी के प्रतिदिन सुबह -शाम सेवन से भी चमकी या एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम रोग से बचाव हो जाता है ।


paralysis disease

लकवा या पक्षाघात रोग :- पक्षाघात या लकवा दिमाग का एक अत्यंत घातक रोग है,जो मस्तिष्क में रक्त का परिसंचरण ठीक तरीके से न होने की या रीढ़ की हड्डी में किसी बीमारी या विकार के कारण होता है।लकवा या पक्षाघात किसी एक मांसपेशी या समूह या शरीर के बड़े हिस्से को प्रभावित कर सकता है।मस्तिष्क से अंगों में सन्देश पहुंचाने वाली तंत्रिकाओं एवं रीढ़ की हड्डी में विकार उत्पन्न होता है,तब प्रभावित अंग तक सन्देश नहीं पहुँचता है और उस अंग पर मस्तिष्क का नियंत्रण समाप्त हो जाता है।इसीलिए वह अंग निष्क्रिय हो जाता है ;इसे ही लकवा या पक्षाघात कहा जाता है।

लक्षण :- लकवा ग्रस्त अंगों में सुन्नपन होना,मांसपेशियों पर नियंत्रण न होना,शरीर के एक तरफ या दोनों तरफ के अंगों का प्रभावित होना,शारीरिक समन्वय में कमी,सिरदर्द,मुंह से लार गिरना,बोलने,सोचने,समझने,लिखने -पढ़ने में कठिनाई,साँस फूलना,मूत्राशय या आँतों के नियंत्रण में कमी,देखने -सुनने में परेशानी,उल्टी आदि लकवा या पक्षाघात के प्रमुख लक्षण हैं।

कारण :- स्ट्रोक,आघात,जन्मदोष विकार,दवाओं का कुप्रभाव,मस्तिष्क में विकार,रक्त संचरण में बाधा,रीढ़ की हड्डी में खराबी आदि लकवा या पक्षाघात के मुख्य कारण हैं।

उपचार :- (1) उड़द,कौंच के बीज,एरंड मूल,बला,हींग और सेंधा नमक का काढ़ा बनाकर प्रतिदिन सुबह -शाम सेवन करने से लकवा या 

                    पक्षाघात की बीमारी ठीक हो जाती है।

               (2) बायबिडंग,अजमोद,पीपल,पीपलामूल,काली मिर्च,सोंफ,देवदारु,चीते की छाल,हरड़ और सेंधा नमक 10-10 ग्राम;सोंठ और 

                     विधायरा 100-100 ग्राम लेकर कूट पीस कपड़छान कर चूर्ण बनाकर 4-5 ग्राम प्रतिदिन सुबह -शाम गर्म जल के साथ सेवन 

                     करने से लकवा या पक्षाघात समूल नष्ट हो जाता है।

                (3) एरंडी का तेल,गंधक,हरड़,बहेड़ा,आंवला और शुद्ध गूगल समान भाग लेकर और एक -एक ग्राम की गोली बनाकर प्रतिदिन 

                      गर्म जल के साथ सेवन करने से लकवा या पक्षाघात की बीमारी दूर हो जाती है।

                (4) पुनर्नवा,देवदारु,गोखरू,गिलोय,एरंडमूल,अमलताश का गूदा समान भाग लेकर जौ कूट कर इसकी 25 ग्राम की मात्रा आधा 

                        लीटर जल में डालकर काढ़ा बनावें और जब 100  ग्राम शेष बचे तो उसमें 25 ग्राम एरंड का तेल और 5 ग्राम सोंठ का चूर्ण 

                        मिलकर पिला देने से लकवा या पक्षाघात की बीमारी दूर हो जाती है।


aneurysm disease

धमनी स्फीति या धमनी विस्फार रोग  :- आज वर्तमान समय में प्रदूषित वातावरण में ही मानव सांस लेने के लिए मजबूर है।नतीजन सांस सम्बन्धी अनेक रोगों से ग्रस्त हैं।उनमें धमनी स्फीति या धमनी विस्फार भी एक गंभीर बीमारी है।धमनी स्फीति धमनी के स्थानीय उभार को कहते हैं,जिसमें धमनी की भित्ति दुर्बल हो जाती है तब वहां खिंचाव होने के कारण प्रवाहित रक्त के दाब के कारण उभार उत्पन्न हो जाता है,यही धमनी स्फीति या धमनी विस्फार है।यह धमनी स्फीति शरीर के किसी भी अंग में हो सकती है ;किन्तु पैरों एवं मस्तिष्क की धमनियों में विशेष रूप से पाई जाती है।इसमें स्फीति स्थल पर दबाव की वजह से पीड़ा होती है और कभी -कभी तो धमनी फट भी जाती है और तीव्र रक्तस्राव होता है।

लक्षण :- सिरदर्द अचानक शुरू होना,होश खोने लगना,मितली और उल्टी,चक्कर आना,चलते हुए गिर जाना,गर्दन अकड़ जाना,धुंधला दिखना,रौशनी से संवेदनशीलता आदि धमनी स्फीति या धमनी विस्फार के प्रमुख लक्षण हैं।

कारण :- आनुवांशिक कारण,धूम्रपान,बीमारियां,उच्च रक्तचाप,ऐनियरिज्म से सम्बंधित समस्याएं आदि धमनी स्फीति के मुख्य कारण हैं।

उपचार :- (1) अश्वगंधा पाउडर का प्रतिदिन सुबह -शाम सेवन दूध के साथ करने धमनी स्फीति की समस्या का समाधान हो जाता है।

              (2) सहजन की जड़ का काढ़ा बनाकर प्रतिदिन सुबह -शाम पीने से धमनी स्फीति रोग दूर हो जाता है।

              (3) बाह्मी चूर्ण एक चम्मच ताजे जल के साथ प्रतिदिन सुबह सेवन करने से धमनी स्फीति रोग दूर हो जाता है।

              (4) हल्दी,अम्बा हल्दी,दारू हल्दी और बच सबको समान मात्रा में लेकर कूट पीस कपड़छान कर चूर्ण बना लें और प्रदिदिन सुबह -शाम दूध में एक चम्मच डालकर पीने से धमनी स्फीति रोग नष्ट हो जाता है।

              (5) गिलोय का काढ़ा बनाकर सुबह -शाम पीने से धमनी स्फीति रोग दूर हो जाता है।

              (6) शंखपुष्पी चूर्ण एक चम्मच लेकर एक गिलास pani  में डालकर उबालें और जब एक चौथाई रह जाने पर छान कर पीने से खुछ ही दिनों में धमनी स्फीति दूर हो जाता है।


brain hemorrhage

ब्रेन हेमरेज :- ब्रेन हेमरेज एक प्रकार का मानसिक दौरा है,जो दिमाग में धमनी के फटने के कारण होता है।फलस्वरूप आसपास के ऊतकों में रक्तस्राव हो जाता है और मस्तिष्क की कोशिकाओं का नाश कर देता है।मस्तिष्क से खून के बहने के कारण लोगों को बोलने में कमजोरी अनुभव करने लगता है,चलते -चलते गिर जाता है और जानलेवा साबित होता है।ब्रेन हेमरेज कई प्रकार के होते हैं-(1)इंट्रासेरेब्रल हेमरेज - दिमाग के अंदर रक्तस्राव (2) सबरकनाइड हेमरेज -दिमाग और उसे सुरक्षित करने वाली झिल्ली के बीच रक्तस्राव (3) सबड्यूरल हेमरेज - ड्यूरा की निचली सतह और दिमाग के ऊपरी हिस्से के बीच रक्तस्राव (4) एपीड्यूरल हेमरेज - खोपड़ी और दिमाग के बीच रक्तस्राव।

लक्षण :- अचानक तेज सिरदर्द,दौरे पड़ना,उल्टी,चक्कर आना,चलते -चलते गिर जाना,बेहोश हो जाना,शरीर का सुन्न पड़ जाना,बोल न पाना,लिखने -पढ़ने में परेशानी,शरीर के अंगों में समन्वय न रहना,स्वाद का ढंग से पता न चलना,कोमा में जाना आदि ब्रेन हेमरेज के प्रमुख लक्षण  हैं।

कारण :- सर में तेज चोट लग्न,उच्च रक्तचाप,आर्टरीज का हिस्सा कमजोर पड़ना,दिमाग की रक्तवाहिकाएं कमजोर होना,रक्तवाहिकाओं में प्रोटीन का जमा होना,हीमोफीलिया के कारण,दिमाग में ट्यूमर,धूम्रपान,अल्कोहल का ज्यादा सेवन,गुटका एवं तम्बाकू खाना आदि ब्रेन हेमरेज के मुख्य कारण हैं।

प्रभाव- ब्रेन हेमरेज की जटिलताएँ की वजह से तंत्रिका कोशिकाएँ शरीर के बाँकी अंगों से समन्वय नहीं कर पाती हैं;जिसका प्रभाव निम्न हैं - याददाश्त खोना,बोलने की क्षमता कम होना,शारीरिक अंगों के हिलने -डुलने में प्रभाव पड़ना,लकवा मार जाना :,खाना निगलने में परेशानी,आँखों की रौशनी काम होना आदि।

उपचार :- (1) गिलोय रस का प्रतिदिन चार बार सेवन से ब्रेन हेमरेज ठीक हो जाता हैं।

              (2) हल्दी,दारू हल्दी,अम्बा हल्दी,बच,शंखपुष्पी,ब्राह्मी और जटामांसी सामान भाग लेकर कूट पीसकर चार चम्मच लेकर दो कप 

                   पानी में उबालें और एक कप बच जाने पर छानकर प्रतिदिन सुबह दोपहर शाम पीने से ब्रेन हेमरेज ठीक हो जाता हैं।

              (3) अश्वगंधा पाउडर का सेवन प्रतिदिन सुबह -शाम करने से ब्रेन हेमरेज से उत्पन्न समस्या से मुक्ति मिल जाती हैं।

              (4) सहजन की जड़ का काढ़ा बनाकर प्रतिदिन सुबह -शाम पीने से ब्रेन हेमरेज ठीक हो जाता हैं।

              (5) ब्राह्मी के चूर्ण का सेवन प्रतिदिन सुबह -शाम ताजे जल के साथ करने से ब्रेन हेमरेज होने की समस्या से मुक्ति मिल जाती हैं ।

              (6) शंखपुष्पी के चूर्ण का सेवन प्रतिदिन सुबह -शाम ताजे जल के साथ करने से ब्रेन हेमरेज में बहुत आराम मिलता हैं।


neuralgia disease

नसों में दर्द :- नसों में दर्द एक अतिसंवेदनशील एवं गंभीर रोग है,जो तंत्रिका तंत्र की क्षति एवं ख़राब तंत्रिका तंत्र के कारन होता है।यह दर्द अक्सर  तेज एवं जलन वाले दर्द के समान होता है।यह कभी-कभी अपने आप ठीक भी हो जाता है ;किन्तु कई मामलों में दीर्घकालिक भी हो सकता है।नसों के दर्द को फैंटम लिंब सिंड्रोम भी कहा जाता है।जब चोट या किसी बीमारी की वजह से शरीर से एक हाथ या पैर को हटा दिया गया हो;किन्तु इसके बाद भी एक दुर्लभ स्थिति तब होती है जब मस्तिष्क को नसों के दर्द का संकेत मिलता है,जिसका मूल कारन हटाए गए अंग हों।नसों में तेज दर्द होने की वजह कोई बीमारी ही हो यह जरुरी नहीं है।शरीर के किसी अंग का लम्बे समय तक दबा रह जाना,कभी -कभी पैरों का सो जाना भी एक कारन हो सकती है।

लक्षण :-तीव्र दर्द,जलन या भोंकने जैसा दर्द होना,सूई चुभने जैसा एहसास होना,लम्बे समय तक असामान्य महसूस करना,सोने में कठिनाई,नींद न आना,सुन्न पड़ना और दर्द हाथों एवं पैरों में होना आदि नसों में दर्द के प्रमुख कारण हैं।

कारण :-दुर्घटनाएं,संक्रमण जैसे एचआईवी /एड्स,उपदंश,चिकनपॉक्स आदि,सर्जरी,बीमारी के कारण,विटामिन बी की कमी,रीढ़ की हड्डी में गठिया,थायराइड आदि नसों में दर्द के प्रमुख कारण हैं।

उपचार :-(1) मेथी के बीज को पानी में भिंगो कर एक -दो घंटे के बाद पीसकर पेस्ट बनाकर प्रभावित क्षेत्र पर लगाने से नसों का दर्द ठीक हो 

                  जाता है।

             (2) दो से तीन चम्मच नारियल तेल लेकर उसमें दो से तीन चम्मच कपूर का तेल मिलाकर गर्म कर प्रभावित क्षेत्र पर लगाकर मसाज 

                  करने से नसों का दर्द ठीक हो जाता है।

             (3) एक गिलास दूध में एक चम्मच हल्दी पाउडर डालकर मिला लें और गर्म कर पीने से नसों का दर्द समाप्त हो जाता है ।

             (4) दो मुठ्ठी चावल की भूसी लेकर तवे पर गर्म कर एक मुलायम कपड़े में बांध कर सेंक लगाने से भी नसों का दर्द दूर हो जाता है ।

             (5) लौंग के तेल की मालिश से भी नसों का दर्द समाप्त हो जाता है ।

             (6) गर्म पानी से स्नान करने से भी नसों का दर्द दूर हो जाता है ।


sydenham chorea disease

अंगों पर काबू खोने का रोग(सिडेन्हम कोरिया रोग) :- अंगों पर काबू खोने का रोग एक बहुत ही गंभीर तंत्रिका रोग है।इसमें रोगी के शरीर का एक ओर के अंग हिलने लगता है जो दिमाग से नियंत्रण समाप्त होने के कारण ऐसा होता है।इस बीमारी के गंभीर होने की दशा में हृदय के वाल्व तक क्षतिग्रस्त हो सकते हैं।इस रोग से ग्रसित व्यक्ति के शरीर विशेषकर चेहरा,हाथ एवं पैर में तेज,अनियंत्रित और बिना किसी कारण के हरकत शुरू हो जाती है।यह एक अत्यंत दुर्लभ तंत्रिका तंत्र विकार है।प्रारम्भ में इसके कोई लक्षण दिखाई नहीं पड़ते हैं किन्तु इन्फेक्शन होने के छः महीने के बाद रोगी जब गंभीर रूप से ग्रसित होकर बीमार हो जाता है तब इसका पता चलता है।आयुर्वेद के अलावा किसी भी चिकित्सा पद्धति में इसका इलाज नहीं है।इस बीमारी को सिडेन्हम कोरिया,कोरिया माइनर,रुमेटिक कोरिया,सेंट वाइटस डांस और सिडेन्हम डिजीज के नाम से भी जाना जाता है।

लक्षण :-गले में सूजन,जोड़ों में सूजन,मांसपेशियों में कमजोरी,व्यवहार में परिवर्तन,बुखार आना,जोड़ों में दर्द आदि अंगों पर काबू खोने के रोग के सामान्य लक्षण हैं।

कारण :-हेल्दी कोशिकाओं का क्षय,रुमेटिक बुखार होने के कारण,मस्तिष्क में सूजन,आनुवांशिक कारण आदि अंगों पर काबू खोने के रोग के प्रमुख कारण हैं।

उपचार :- (1) अश्वगन्धा पाउडर एक चम्मच लेकर एक गिलास गर्म दूध में मिलाकर एक-दो महीने तक पीने से अंगों पर काबू खोने के रोग का नाश हो जाता है।

              (2) त्रिफला,त्रिकूट और जटामांसी सबको सामान भाग लेकर कूट पीस कर चूर्ण बना लें और प्रतिदिन सुबह -शाम ताजे जल के साथ सेवन एक महीना तक करने से अंगों पर काबू खोने का रोग दूर हो जाता है।

              (3) बच  चूर्ण का देशी घी के साथ सेवन करने से सिडेन्हम कोरिया रोग दूर हो जाता है।

              (4) शतावर,ब्राह्मी के सेवन से भी सिडेन्हम कोरिया रोग दूर हो जाता है।

              (5) द्राक्षा,पेठा,आंवला,हींग आदि के सेवन से भी सिडेन्हम कोरिया रोग में बहुत फायदा होता है।

              


nervous disease

मधुमेही न्यूरोपैथी:-आज वर्तमान परिवेश में खान -पान में बढ़ते मिलावट एवं प्रदूषित पदार्थों के प्रयोग के कारण लोगों में मधुमेह की बीमारी एक आम समस्या है।दीर्घकालिक महुमेह के रोगियों के रक्त में ग्लूकोज की अत्यधिक मात्रा और वसा जैसे का उच्च स्तर उनकी नसों या रक्त वाहिकाओं के नसों को नुकसान पहुँचाती है;परिणामस्वरूप तंत्रिका तंत्र प्रभावित हो जाती है,जो ऑक्सीजन और पोषक तत्त्व पहुँचाती है।इससे खोपड़ी के बाहर,रीढ़ की हड्डी,ह्रदय,मूत्राशयआँतों एवं पेट की तंत्रिका के काम -काज प्रभावित होतीं हैं।वास्तव में मधुमेही न्यूरोपैथी एक प्रकार की तंत्रिका तंत्र की क्षति है,जो डायविटीज से पीड़ित व्यक्तियों को ही होती है,जो निम्न हैं - (1)पेरिफेरल न्यूरोपैथी: -यह पैरों को प्रभावित करती है।(2)ऑटोनोमिक न्यूरोपैथी: -यह अनैच्छिक कार्यों को नियंत्रित करने वाली तंत्रिका को प्रभावित करती है।(3)फोकल न्यूरोपैथी: -यह हाथ,पैर,सिर,धड़ के एकल नसों को प्रभावित करती है।(4)प्रॉक्सिमलन्यूरोपैथी:-यह कूल्हों या जांघ की तंत्रिका की क्षति करता है।

लक्षण:-कब्ज या अतिसार,लैंगिक असमर्थता,मूत्र असंयम,नपुंसकता,चेहरे,मुँह और पलकों का झुकना या झुलना,दृष्टि परिवर्तन,चक्कर आना,मांसपेशियों में कमजोरी,निगलने में दिक्कत,बोलने में दुर्बलता,मांसपेशी संकुचन,अग्रांगों की सुन्नता और झुनझुनी,शरीर के किसी भाग में असामान्य संवेदना,जलन या तीव्र दर्द आदि मधुमेही न्यूरोपैथी के प्रमुख लक्षण हैं।

उपचार:-(1)अश्वगंधा की जड़ का पाउडर सुबह -शाम जल के साथ सेवन करने से मधुमेही न्यूरोपैथी से उत्पन्न विकार से मुक्ति मिल जाती है।

     (2)नीम के पत्ते,जामुन के पत्ते,बेल के पत्ते,तुलसी के पत्ते,अमरुद के पत्ते और आम के पत्ते,सबको समान मात्रा में लेकर पीस कर चटनी बनाकर सुबह खाली पेट एवं शाम को खाने से पहले सेवन करने से मधुमेही न्यूरोपैथी से होने वाले विकार से मुक्ति मिल जाती है।

     (3)शिलाजीत के सेवन से भी रोग प्रतिरोधक प्रणाली मजबूत हो जाती है ,जिससे मधुमेही न्यूरोपैथी से होने वाले विकार दूर हो जाते हैं।

   (4) इवनिंग प्राइमरोज तेल के प्रयोग से भी इस बीमारी में बहुत फायदा होता है।


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  लिवर के रोग