pimple disease

मुँहासा या पिटिका रोग :- मुंहासा एक सामान्य रोग है जो प्रायः 14 से 30 साल तक की उम्र में ज्यादा होता है।यह तैलीय त्वचा वाले लोगों को अधिक होते हैं।मुंहासे वास्तविक रूप से तेल ग्रंथियों से सम्बंधित एक विकार है,जो हार्मोनल परिवर्तनों के फलस्वरूप यानि हार्मोन असंतुलन की वजह से होता है।त्वचा में स्थित रोम छिद्र तेलग्रंथि वाली कोशिकाएं से जुड़ी होती हैं और जब हार्मोन असंतुलित होता है;तब यह रोम छिद्रों को अवरुद्ध कर देता है।परिणामस्वरूप त्वचा अपनी स्निग्धता बरक़रार रखने में असहज महसूस करने लगती है।यही वजह मुहांसे का कारण बनती है।

मुहांसे का प्रकार :- व्हाइट हेड्स ,ब्लैक हेड्स ,पेपुल्स,दाना,नोड्यूल एवं पुटी (cyst)आदि मुहांसे के प्रकार हैं।

लक्षण :- चेहरे पर लालपन लिए हुए फुंसियां,गाल व नाक के आसपास फुंसियां,त्वचा के नीचे मवाद का बनना,काले छोटे-छोटे धब्बे हो जाना,चेहरे पर बंद छिद्रित छिद्र,खुली छिद्रित छिद्र,आदि मुहांसे के प्रमुख लक्षण हैं।

कारण :- हार्मोनल असंतुलन,पाचन तंत्र में दिक्क्तें,नींद की कमी,क्रीम,लोशन आदि का अधिक प्रयोग करना,अत्यधिक चाय।कॉफ़ी का उपयोग,वासा ग्रंथियों के स्राव का रुक जाना,तनाव,वंशानुगत,जंक एवं फ़ास्ट फ़ूड का अत्यधिक प्रयोग करना आदि मुहांसे के मुख्य कारण हैं।

उपचार :- (1) कच्चे दूध में नींबू मिलाकर रुई द्वारा चेहरे को साफ करने से मुहांसे धीरे-धीरे ठीक हो जाते हैं।

              (2) मुल्तानी मिट्टी में नींबू व टमाटर का रस मिलाकर मुहांसे पर लगाकर और आधे घंटे बाद साफ कर लेने से कुछ ही दिनों में ठीक 

                    हो जाता है।

              (3) मुल्तानी मिट्टी में चन्दन पाउडर और गुलाब जल मिलाकर मुहांसे पर लगाने से ठीक हो जाते हैं।

              (4) एक चम्मच तुलसी के पत्तों का पाउडर,एक चम्मच नीम के पत्तों का पाउडर एवं एक चम्मच हल्दी पाउडर गुलाब जल के साथ 

                    मिलाकर मुहांसे पर लगाने से ठीक हो जाता है।

              (5) मसूर की दाल का पाउडर बनाकर रख लें और दो चम्मच में चुटकी भर हल्दी,नींबू की कुछ बूंदें,दही मिलाकर मुहांसे पर लगाने 

                   से ठीक हो जाता है।

              (6) खीरे का रस,टमाटर का रस,मुल्तानी मिट्टी,हल्दी चूर्ण,चन्दन पाउडर सबको मिलाकर मुहांसे पर लगाने से ठीक हो जाता है।


skin pigmentation disease

चेहरे की झाईं रोग :- चेहरे की झाईं रोग आधुनिक परिवेश में एक गंभीर समस्या के रूप में दृष्टिगोचर हो रहा है,जो चेहरे की सुंदरता को नष्ट कर देता है।वास्तव में चेहरे की झाईं रोग तेज धूप में ज्यादा देर तक रहने से त्वचा में स्थित मेलेनोसाइट्स नामक ग्रंथि ज्यादा मेलेनिन उत्पादित करने लगता है परिणामस्वरूप चेहरे पर झाईं बनने लगता है।चेहरे पर झाईं बनने का मुख्य कारण सूर्य की पराबैंगनी किरणों का दुष्प्रभाव ही है।आज के समय में विवाहित स्त्रियों या बड़े उम्र की महिलाओं को ज्यादातर झाईं होती हैं ;किन्तु छोटी उम्र की लड़कियाँ भी इससे पूरी तरह से बची नहीं हैं।ज्यादातर महिलाओं में रक्त एवं श्वेत प्रदर की बीमारियों के कारण भी चेहरे पर झाईं बनने लगती है।अधिकांशतः यह विटामिन ई या बी कॉम्प्लेक्स की न्यूनता,खून की कमी आदि के कारण झाईं रोग होती है।

प्रकार :- (1)यूमेलेनिन :- यह बालों,त्वचा और निप्पल के चारों ओर काले हिस्से में पाया जाता है । बालों ,त्वचा और आँखों का काला और भूरा रंग मेलेनिन के इसी प्रकार पर निर्भर करता है।

(2) फियोमेलेनिन :- यह बालों और त्वचा में पाया जाता है।यह मेलेनिन त्वचा और बालों को गुलाबी व लाल रंग प्रदान करता है;किन्तु सूर्य की हानिकारक किरणों यूवी के दुष्प्रभाव से रक्षा नहीं कर पता है।

(3) न्यूरोमेलेनिन :- यह मेलेनिन मस्तिष्क के विविध भागों में पाए जाते हैं।इसकी न्यूनता से तंत्रिका तंत्र सम्बन्धी विकार हो जाते हैं।

लक्षण :- चेहरे पर हलके भूरे रंग के दाग का हो जाना,लाल रंग का होना,हल्के काले रंग का हो जाना,चेहरे का निस्तेज हो जाना आदि झाईं रोग के प्रमुख लक्षण हैं।

कारण :- सूर्य की रौशनी में ज्यादा देर तक रहना,त्वचा में स्थित मेलेनिन का ज्यादा सक्रिय होना,वंशानुगत कारण,बढ़ती उम्र,गर्भावस्था,स्त्रियों को रक्त एवं श्वेद प्रदर की बीमारियां,कॉस्मेटिक्स सौंदर्य प्रसाधनों का अत्यधिक                  प्रयोग,कब्ज,खून की कमी,इम्यून सिस्टम की गड़बड़ी,विटामिन ई एवं बी कॉम्प्लेक्स की कमी आदि झाईं रोग के मुख्य कारण हैं।

उपचार :- (1) केले एवं नीम्बू के रस को मिलाकर चेहरे की झाईं पर लगाने से झाईं रोग 

                   का नाश हो जाता है । 

              (2) लहसुन एवं शहद को मिलाकर पेस्ट बनाकर चेहरे की झाईं पर लगाने 

                   से झाईं रोग दूर हो जाता है।

              (3) संतरे के छिलके को पीसकर तुलसी के रस में मिलाकर चेहरे की झाईं 

                    पर लगाने से झाईं ठीक हो जाता है।

              (4) चिरोंजी को पीसकर दूध में मिलाकर पेस्ट बनाकर लगाने से चेहरे की 

                   झाईं रोग का नाश हो जाता है।

              (5) अनानास,पका पपीता,जामुन,संतरा,सेब,स्ट्राबेरी,शहतूत आदि को चेहरे 

                   की झाईं पर लगाने से ठीक हो जाता है।

              (6) कच्चे पपीते को पीसकर पेस्ट बनाकर उसमें थोड़ा सा नीम्बू का रस 

                   मिलाकर लगानेसे चेहरे की झाईं ठीक हो जाता है।

              (7) प्याज और लहसुन के पेस्ट को सिरके की कुछ बूंदों के साथ मिलाकर 

                   लगाने से झाईं रोग ठीक हो जाता है।

              (8) कच्चे आलू और उबले काबुली चने का पेस्ट बनाकर चेहरे की झाईं पर 

                   लगाने से झाईं ठीक हो जाता है।

             (9) संतरे के छिलके के चूर्ण को गुलाब जल में मिलाकर झाईं पर लगाने से 

                  झाईं का दाग ठीक हो जाता है।

             (10) एलोवेरा जेल प्रतिदिन चेहरे की झाईं पर लगाने से दूर हो जाता है।

             (11) बैगन का रस निकालकर झाईं पर लगाने से ठीक हो जाता है।

            


xeroderma disease

शुष्क त्वचा या त्वचाखरता रोग :- शुष्क त्वचा या त्वचाखरता रोग एक अत्यंत खतरनाक रोग है,जिसमें त्वचा में रुखापन,खुरदरी त्वचा,त्वचा में पपड़ी या छोटी दरारें पड़ जाती हैं।जाड़े के मौसम में बाहर की ठंडी हवा और अंदर की गर्म हवा के कारण एक निम्न आद्रता वाला वातावरण का पैदा हो जाने के कारण होता है।इस रोग में त्वचा अपनी स्वाभाविक नमी खो देता है ;परिणामस्वरूप उसमें दरार और पपड़ी पड़ने लगती है,जो काफी भद्दी और पीड़ादायक हो जाती है।जेरोडर्मा आमतौर पर खोपड़ी,पैरों के निचले भाग,बाँह,हाथों,पेट के किनारों और जाँघों के आसपास होती है।वास्तव में यह समस्या अध्यावरणी तंत्र की गड़बड़ी के कारण होती है।

लक्षण :- खुरदरी,सुखी त्वचा पपड़ी या छोटी दरारें युक्त होना,त्वचा का उखाड़ना,पपड़ी 

           पड़ना,त्वचा में लगातार खुजली,त्वचा में दरार,लाल रंग के निशान,त्वचा में 

           सूजन आदि शुष्क त्वचा या त्वचाखरता रोग के प्रमुख लक्षण हैं|

कारण :- बार-बार स्नान करना और हाथ धोना,रूखे साबुन से हाथ धोना,विटामिन ए 

            एवं डी की कमी,सूरज की किरणों से,प्रदुषण,दवाओं का कुप्रभाव,आनुवांशिक 

            कारण,बढ़ती उम्र,दमा और थायरॉइड आदि शुष्क त्वचा या त्वचाखरता रोग 

            के मुख्य कारण हैं।

उपचार :- (1) ओमेगा-3 युक्त फल और सब्जियाँ (जैसे-अखरोट,सफोला तेल,दलिया,

                    सादे पानी की मछलियाँ आदि ) खाने से त्वचा की नमी को उड़ने से 

                   बचाने वाले तंत्र को मजबूती मिलती है और शुष्क त्वचा या त्वचाखरता 

                   रोग होने की सम्भावना नहीं रहती है।

(2) एलोवेरा जेल के प्रतिदिन सुबह-शाम प्रयोग से शुष्क त्वचा या त्वचाखरता रोग ठीक 

     हो जाता है। 

(3) एक चम्मच ग्लिसरीन और चार चम्मच गुलाब जल मिलाकर लगाने से शुष्क त्वचा 

     या त्वचाखरता रोग ठीक हो जाता है।

(4) दो चम्मच मुल्तानी मिटटी,एक चम्मच खीरे का रस और एक चम्मच शहद या दूध 

     लेकर सबको मिलाकर प्रतिदिन सुबह लगाने से शुष्क त्वचा या त्वचाखरता रोग 

      ठीक हो जाता है।

(5) एक चम्मच सेब का सिरका,दो चम्मच पानी,एक चम्मच शहद लेकर सबको 

     मिलाकर लगाने से शुष्क त्वचा या त्वचाखरता रोग ठीक हो जाता है।

(6) दो चम्मच शहद एवं एक चम्मच दालचीनी पाउडर मिलाकर लगाने से शुष्क त्वचा 

     या त्वचाखरता रोग दूर हो जाता है।

(7) दो चम्मच मेथी के बीज,दो चम्मच जैतून के तेल या नारियल के तेल को मिलाकर लगाने से शुष्क त्वचा या त्वचाखरता रोग ठीक हो जाता है । 







 


chilblains disease

बिवाई रोग :- बिवाई रोग एक आम समस्या है,जो सर्दियों में अक्सर ठन्डे तापमान के कारण हो जाते हैं।इसमें ऐड़ियों के नीचे की बाहरी सतह की त्वचा कड़ी,सूखी एवं मोटी हो जाती है।कभी-कभी तो बिवाई इतनी गहरी एवं दरार युक्त हो जाती कि उनसे रक्त निकलने लगता है एवं चलने-फिरने में अत्यंत कष्ट होता है।बिवाई रोग अधिकतर पैरों में होता है;किन्तु हाथों में भी देखने को मिलता है।

लक्षण :- सूखी त्वचा,ऐड़ी की त्वचा में लालपन,गंभीर सूजन,ऐड़ी में दरारें,ऐड़ी से रक्त बहना,ऐड़ी में खुरदरापन,पैर में जलन आदि बिवाई रोग के प्रमुख लक्षण हैं।

कारण :- मोटापा,लगातार खाली पैर चलना,पसीने की निष्क्रिय ग्रंथियाँ,सूखी जलवायु में रहना,जूते पीछे से खुले हुए पहनना,मधुमेह,कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली,थायराइड,एक्जीमा,शुष्क त्वचा आदि बिवाई के मुख्य कारण हैं

उपचार :- (1) शहद की मालिश से बिवाई रोग ठीक हो जाता है ।

              (2) सरसों के 100 ग्राम तेल में 50 ग्राम देशी मोम डालकर और उसमें कपूर चूर्ण डाल कर रख लें ।एक सप्ताह के सेवन से बिवाई 

                   रोग ठीक हो जाता है।

              (3) नारियल तेल के सेवन से भी बिवाई रोग ठीक हो जाता है ।

              (4) केले के गूदे को बिवाई में लगाने से बिवाई रोग ठीक ही जाता है ।

              (5) जैतून तेल की मालिश से भी बिवाई रोग ठीक हो जाता है ।

              (6) एलोवेरा जेल लगाने से बिवाई रोग ठीक हो जाता है ।


               













     


eczema disease

एक्जीमा या छाजन रोग  :- एक्जीमा या छाजन रोग त्वचा की एक बीमारी है ,जिसमें त्वचा सूखी,खुरदरी,अत्यंत खुजलीदार एवं धब्बेदार हो जाती है ।एक्जीमा या छाजन रोग की उत्पत्ति अति संवेदनशीलता एलर्जी के कारन होती है । एक्जीमा या छाजन रोग में त्वचा में खुजली,तनाव या खरोंच लगने से बहुत कष्ट होता है ।यह रोग अधिकांश घुटनों के पीछे,कोहनी के मोड़ों पर ,कलाइयों ,गला एवं पैरों पर पाए जाते है ।यह कई प्रकार के होते हैं ,जैसे :- संस्पर्श जो किसी खास पदार्थ के संपर्क में आने ,त्वग्वसास्राव में सिर पर चकत्ते और लालिमायुक्त,चक्राभ एक्जीमा या छाजन जो सिक्के के आकार के चकत्ते या घाव ।

लक्षण :- त्वचा में खुजली,शुष्क खुरदरी त्वचा,त्वचा पर दानेदार धब्बे,सिक्के के आकार के चकत्ते या घाव,खुजलाने पर पानी की तरह चिपचिपा स्राव आदि एक्जीमा या छाजन रोग के प्रमुख लक्षण हैं ।

कारण :- शुष्क त्वचा,शुष्क जलवायु,एलर्जी के कारण,आनुवांशिक उत्परिवर्तन,प्रतिरक्षा प्रणाली की निष्क्रियता,साबुन या डिटर्जेंट,धूल के कण,पराग एवं खाद्य -पदार्थों से एलर्जी,चिंता एवं मानसिक तनाव आदि एक्जीमा या छाजन रोग के मुख्य कारण हैं ।

उपचार :- (1) पापीती का दूध एक्जीमा या छाजन रोग को नष्ट करता है ।

              (2) सफ़ेद आक के फूल को को छाया में सुखाकर नारियल में जलाएं धीमी आंच पर और ठंडा कर उसमें ढेला वाला कपूर चूर्ण कर 

                    मिलाकर सुबह -शाम लगाने से एक्जीमा या छाजन रोग बहुत जल्दी ठीक हो जाता है ।

              (3) तुलसी के पत्ते को नीबू के रस के साथ पीसकर लगाने से एक्जीमा या छाजन रोग ठीक हो जाता है ।

              (4) नीम के पत्ते एवं निबौली को तेल में धीमी आंच  में पकाएं और छानकर एक्जीमा या छाजन पर लगाने से ठीक हो जाता है ।

              (5) नीम की छाल ,त्रिफला और परबल के पत्ते को उबालकर एक्जीमा या छाजन से प्रभावित जगहों को धोने से एक्जीमा या छाजन 

                    रोग दूर हो जाता है । 


sjogrens syndrome disease

श्रोगेन सिंड्रोम रोग :- श्रोगेन सिंड्रोम रोग एक कष्टप्रदायक बीमारी है।इस बीमारी में शरीर में नमी पैदा करने वाली ग्रंथियां नमी पैदा करना बंद कर देती है,परिणामस्वरूप शुष्क मुख एवं शुष्क नेत्र की समस्या पैदा हो जाती है।इसके अतिरिक्त श्रोगेन रोग के कारण शरीर में प्रतिरोधक क्षमता की कमी हो जाने के कारण खुजली,लालिमा,त्वचा का फटना या गलना आदि की समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं।श्रोगेन सिंड्रोम से ग्रस्त रोगी की सूखी त्वचा से परेशानी लगभग पूरे वर्ष बनी रहती है,फिर भी इसके लक्षण सर्दी के मौसम में अधिक प्रबल हो जाते हैं।श्रोगेन सिंड्रोम रोग में प्रतिरोधक क्षमता में ह्रास एवं नमी पैदा करने वाली ग्रंथियों का निष्क्रिय होना प्रमुख कारण है।

लक्षण :- मुंह और आँखें सूखना,मुंह में छाले,चुभन,स्वाद न महसूस करना,आवाज फटना,निगलने में परेशानी,आँखों में सूखापन,जोड़ों में अकड़न,रूखी त्वचा,सूखी खांसी आदि श्रोगेन सिंड्रोम के प्रमुख लक्षण हैं।

कारण :- नमी पैदा करने वाली ग्रंथियों का निष्क्रिय हो जाना,प्रतिरोधक शक्ति का काम हो जाना आदि श्रोगेन सिंड्रोम के मुख्य कारण हैं।

उपचार :- (1) एलोवेरा जूस के प्रतिदिन सुबह -शाम सेवन करने से श्रोगेन सिंड्रोम रोग से मुक्ति मिल जाती है।

              (2) गुलाब जल में ग्लिसरीन मिलाकर पूरे शरीर पर लगाने से भी श्रोगेन सिंड्रोम रोग दूर हो जाता है।

              (3) नारियल तेल में कपूर मिलाकर शरीर पर लगाने से भी सूखी त्वचा से मुक्ति मिल जाती है।

              (4) अश्वगंधा पाउडर के सेवन से भी श्रोगेन सिंड्रोम रोग दूर हो जाता है।

              (5) मालकांगनी के बीजों के तेल को पूरे शरीर पर लगाने से श्रोगेन सिंड्रोम रोग दूर हो जाता है।


herpes zoster

हर्पीस जोस्टर:-हर्पीस जोस्टर एक बहुत ही कष्टप्रदायक त्वचा की बीमारी है,जो कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली वाले लोगों को होती है। इसमें त्वचा पर पानी से भरे हुए छोटे-छोटे दाने एक ही साथ शरीर के एक हिस्से दाएं या बाएं भाग में निकलती है।यह बीमारी बहुत संक्रामक होती है,जो चिकन पॉक्स के वायरस वेरिसेला जोस्टर के कारण होती है।इसी वायरस के नाम पर ही इस बीमारी का नाम हर्पीस जोस्टर पड़ा है।यह बीमारी उस व्यक्ति को होने की सम्भावना ज्यादा होती है ,जिन्हें कभी पहले चिकन पॉक्स हुआ हो;क्योंकि यह वायरस चिकन पॉक्स ठीक होने के बाद नर्वस सिस्टम में चला जाता है और जब रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ जाती है तब यह वायरस नर्वस सिस्टम के रास्ते  त्वचा पर अपना प्रभाव छोटे-छोटे दाने के रूप में प्रकट करती है,जो पानी से भर जाते है और बहुत कष्ट देते हैं।

लक्षण:-त्वचा पर लाल-लाल फुंसियां निकलना और पानी भर जाना,बुखार होना,जोड़ों में दर्द,सिरदर्द,थकानआदि 

           हर्पीस जोस्टर के मुख्य लक्षण हैं।

उपचार:-(1) भृंगराज के पौधे के सर्वांग को पीस कर हर्पीस पर लगाने से इसका समूल नष्ट होता है।

             (2) एप्पल साइडर विनेगर को पानी में मिलाकर हर्पीस पर लगाने और एक कप पानी में एक चम्मच 

                  विनेगर को मिलाकर पीने से इसका नाश होता है।

              (3) टी ट्री ऑयल और जैतून के तेल को मिलाकर लगाने से हर्पीस जड़ से दूर हो जाती है।

              (4)गुड़हल के पौधे के पत्तों को पीसकर लगाने से हर्पीस तीन-चार दिनों में ठीक हो जाता है।

 


leprosy

कुष्ठ (कोढ़):-यह संसार की प्राचीनतम ज्ञात रोगों में से एक है ।चरक एवं सुश्रुत आदि चिकित्सा शास्त्रियों ने भी इसका विस्तृत विवेचन किया है ।यह बीमारी अधिकांशतः कर्क रेखा के आसपास गर्म देशों के उत्तरी एवं दक्षिणी पट्टी में ही सीमित है । यह अन्य देशों से लगभग उन्मूलित हो चूका है किन्तु भारत ,अफ्रीका और दक्षिणी अमरीका मे यह रोग अधिक व्यापक रूप में है ।कुष्ठ एक संक्रामक रोग है, जो माइक्रो बैक्टीरियल लेप्रो नमक जीवाणु के त्वचा या साँस के द्वारा शरीर में प्रवेश करने के कारण होता है ।कुछ समय बाद त्वचा पर सूखापन लिए हुए लाल या सफ़ेद चकते उभर आते हैं ।इसके बढ़ने के साथ -साथ उँगलियों में विकलांगता आने लगती है और दर्द रहित घावों के साथ हाथों -पांवों की उँगलियाँ गल जाती हैं ।लोग आज भी जो अंधविश्वासी हैं , इसे ईश्वर का प्रकोप मानते हैं और मनुष्य के द्वारा किये गए पापों का परिणाम समझते हैं। इससे दूर रहना,घृणा करना,अपशगुन मानना आदिआज समाज में व्याप्त है । 

उपचार :-(1 )करंज, नीम,और खदिर के 100 -100 ग्राम पत्तों को पानी में उबालकर नहाने से कुष्ठ का नाश होता है ।                                   

             (2 )बाकुची,और टिल 3 -3 ग्राम लेकर मिलाकर थोड़ा पीसकर प्रतिदिन सुबह -शाम सेवन करने से कुष्ठ का नाश होता है ।

             (3)आक की जड़ को छाया में सुखाकर चूर्ण बनाकर रखें और 2 रत्ती चूर्ण में 2 रत्ती सोंठ का चूर्ण मिलाकर शहद के साथ दिन में तीन बार सेवन करने से कुष्ठ का समूल नाश होता है।

              (4 )बाकुची के बीज 25 ग्राम,सफ़ेद मूसली 25 ग्राम,और चित्रक 25 ग्राम लेकर सभी को कूट पीसकर चूर्ण बनाकर 4  ग्राम चूर्ण शहद 

                    के साथ प्रतिदिन सुबह-शाम सेवन करने से कुष्ठ का नाश हो जाता है ।

              (5 )निर्गुण्डी की जड़ को छाया में सुखाकर कूट पीस चूर्ण बनाकर 3 ग्राम सुबह  -शाम पानी के साथ सेवन से कुष्ठ का नाश हो जाता है ।


leucoderma

सफ़ेद दाग रोग  ( ल्यूकोडर्मा या विटिलिगो):-आधुनिक चिकित्सा विज्ञानं के अनुसार सफ़ेद दाग एक त्वचा रोग है । मानव शरीर की त्वचा बाहरी स्तर में 

मैलेनिन नामक एक वर्णक (रंजक )द्रव्य गर्मी से त्वचा की रक्षा करता है ।जब यह मैलेनिन बनाने वाली कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं ;परिणाम स्वरुप 

शरीर के विभिन्न भागों पर सफ़ेद दाग बनने लगता है ।यह बीमारी कोई दर्दनाक नहीं है ,न ही इसके स्वास्थ्य से जुड़े कोई अन्य दुष्प्रभाव हैं,किन्तु इसके भावनात्मक और मनोवैज्ञानिकी परिणाम होते हैं । यह दो शब्दों ल्यूको एवं डर्मा से बना है ।ल्यूको का अर्थ सफ़ेद एवं डर्मा का अर्थ खाल है ;इसलिए इस बीमारी को ल्यूकोडर्मा या सफेद रोग कहते हैं ।

सफ़ेद रोग होने के कारण निम्नलिखित हैं -(1 )यह विकार शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली खुद रंग उत्पादन करने वाली कोशिका को नष्ट कर देता है ।

                                                        (2 )मधुमेह का प्रभाव या थायरायड रोग के कारण 

                                                        (3 )त्वचा का अधिक धुप के संपर्क में आने के कारण 

                                                        (4 )परिवार में पहले किसी को ये बीमारी होने के कारण आदि ।

उपचार:-चाकसू ,पंवार के बीज,वाकुची अंजीर की छाल और नीम की अंतर छाल सबको सामान भाग लेकर चूर्ण बनाकर रख लें । और प्रतिदिन छह माशा चूर्ण लेकर शाम को पानी में भिंगो दे और सवेरे पानी निथार कर पी लें और बची हुई दवा को दागों पर लगा लें ।रोगी को खाने में सिर्फ वेसन की रोटी और घी दें ।इस चूर्ण के सेवन से 40 दिन में सफ़ेद दाग नष्ट हो जायेगा और खाल पहले की तरह ज्यों की त्यों हो जाएगी ।


psoriasis disease

सोरायसिस :-लक्षण :-सोरायसिस मानव शरीर के त्वचा की ऊपरी सतह पर होने वाला एक चर्मरोग है।इसमें त्वचा पर एक मोटी परत के रूप में सिर के बाल के पीछे गर्दन,हाथ की हथेलियों,पांव के तलवों,कोहनी,घुटनों,एवं पीठ पर ज्यादा होती है।इसे छाल रोग के नाम से भी जाना जाता है।इसमें लाल,शुष्क दाने से युक्त परतदार चकते के रूप में होती है।इसमें शुष्क त्वचा होने पर खुजली भी होती है और खुजाने पर चिपचिपा द्रव का श्राव भी होता है,जो बहुत कष्टदायक होता है।

कारण:(1)वंशानुगत ।

          (2)प्रतिरक्षा प्रणाली की गड़बड़ी या अन्य कारणों से भी ।

           (3)तनाव और अधिक आहार असमानता यथा :-दही और मछली खाने ,फ़ास्ट एवं जंक फ़ूड का ज्यादा प्रयोग ,धूम्रपान की अधिकता आदि।

           (4)बैक्ट्रियल संक्रमण के कारण आदि।

उपचार :-सोरायसिस एक असाध्य बीमारी है ,जिसका आयुर्वेद के अतिरिक्त किसी भी चिकित्सा पद्धति में समूल नष्ट करने का इलाज उपलब्ध नहीं है।

 आयुर्वेद इसे असाध्य बीमारी नहीं मानता है।कहने का तात्पर्य आयुर्वेद सोरायसिस को समूल नष्ट करने में सक्षम है।इसी कड़ी में मैंने यह प्रयोग स्वयं अनुभूत किया हुआ यहाँ दिया है।आशा है पाठक गण इसे अपनाकर लाभान्वित होंगे।

उपचार सामग्री:(-1 ).सफ़ेद आक का फूल 500 ग्राम( छाया में सुखाया हुआ )( 2 .)नारियल तेल 250 मिली ,(3 .)ढ़ेलेवाला कपूर  

बनाने की विधि :-सर्वप्रथम कढ़ाही को आग चढ़ाकर उसमें नारियल तेल डालकर गरम करें ,गरम होने पर उसमें छाया में सुखाया हुआ सफ़ेद आक के फूल को डाल कर जलाएं ।जल जाने के बाद उसे उतार कर ठंडा कर उसमें ढ़ेलेवाला कपूर को पीसकर मिलाकर एक साफ शीशी में रख लें और दिन में दो बार लगाएं। ऐसा करने से सोरायसिस जड़मूल से नष्ट होगा।यह स्वयं अनुभूत एवं अचूक औधधि है,इसमें कोई संदेह नहीं है।

नोट :-यह सोरायसिस के आलावा दाद,एग्जीमा,खुश्क एग्जीमा,बहनेवाला एग्जीमा की भी यह अचूक एवं अनुभूत औधधि है।


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