small breast

स्तनों का आकार छोटा होना :- स्त्रियों के आकर्षक एवं सुन्दर व्यक्तित्त्व के लिए स्तनों का पुष्ट आकार एवं सुडौल होना अत्यंत आवश्यक हैं;किन्तु स्तनों का आकार छोटा होना अत्यंत चिंताजनक स्थिति है।स्त्रियां हमेशा अपने स्तनों को पुष्ट,सुडौल एवं आकर्षक बनाने के लिए प्रयत्नशील रहती हैं।उम्र के अनुसार स्तनों का ठीक तरह से विकसित न होना उन्हें सामाजिक एवं मानसिक रूप से तनावग्रस्त बना देती हैं और अपने समाज एवं परिवेश में शर्म एवं हीन भावना से ग्रसित बना देती है।इसका प्रभाव उनके जीवन में स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है।

लक्षण :- स्तनों का आकार छोटा होना,अविकसित स्तनों का होना,शारीरिक दृष्टि से कमजोर,वजन कम होना आदि स्तनों के आकार का छोटा होने के प्रमुख लक्षण हैं।

कारण :- आनुवंशिक कारण,पोषक तत्त्वों का उपयोग नहीं करना,शारीरिक कमजोरी,एस्ट्रोजेन हार्मोन्स की कमी,अत्यधिक मानसिक तनाव,थाइराइड की समस्या,शरीर में वसा की कमी आदि स्तनों का आकार छोटा होने के मुख्य कारण हैं।

उपचार :- (1) मेथी के तेल से प्रतिदिन स्तनों की मालिश करने से स्तनों का छोटा आकार बढ़ कर पुष्ट एवं सुडौल हो जाता है।

              (2) एक चम्मच सोंफ,दो कप पानी में उबालें और उसमें एक या दो चम्मच शहद मिलकर सुबह - शाम पीने से स्तनों के आकार में 

                    वृद्धि होने लगती है और पुष्ट एवं सुडौल हो जाता है।

               (3) दूब घास को सुखाकर रख लें और दो चम्मच सूखा हुआ दूब दो कप पानी में उबालें और शहद मिलकर दिन में दो - तीन बार 

                    सेवन करने से स्तनों का आकार पुष्ट एवं सुडौल हो जाता है।

               (4) जैतून के तेल की नियमित सुबह - शाम मालिश से स्तनों का आकार बढ़ जाता है और पुष्ट एवं सुडौल हो जाता है।

               (5) अश्वगंधा पाउडर का सेवन प्रतिदिन सुबह - शाम दूध के साथ करने से स्तनों का आकार बढ़ जाता है\

               (6) अलसी के प्रतिदिन सेवन से भी स्तनों का आकार बढ़ जाता है।

               (7) वॉल पुश अप व्यायाम द्वारा भी स्तनों के आकार में वृद्धि हो जाती है।

               (8) पोषक तत्त्वों युक्त आहारों के सेवन जैसे - पालक,गाजर,सी फ़ूड,नट्स - काजू,पिस्ता,अखरोट आदि के सेवन से स्तन पुष्ट और 

                    सुडौल हो जाते हैं।

                (9) बादाम तेल की नियमित मालिश द्वारा भी स्तनों का आकार पुष्ट एवं सुडौल हो जाता हैं।

                (10) महानारायण तेल की मालिश से भी स्तन पुष्ट एवं सुडौल हो जातें हैं।

                (11) अश्वगंधा एवं शतावरी लेकर चूर्ण बनाकर सेवन करें और ऊपर से धारोष्ण लेने से स्तनों का आकार बढ़कर पुष्ट एवं सुडौल हो 

                       जाता हैं।

                       




               


sagging breast

स्तनों का ढीलापन :- स्त्रियों की सुंदरता एवं यौवन का आकर्षक निखार विकसित एवं सुडौल स्तनों से दृष्टिगोचर होता है,किन्तु जब स्तनों का  विकसित एवं सुडौल न होना,यूँ कहें कि स्तनों का ढीलापन स्त्रियों को अत्यंत पीड़ा देती है।प्रायः सभी स्त्रियां अपना स्तन पुष्ट,उभार युक्त,विकसित एवं सुडौल बनाने के लिए प्रयत्नशील रहती हैं।वास्तव में स्तनों का ढीलापन होना,उनमें कठोरता का अभाव होना एवं साथ ही समय एवं उम्र के हिसाब से विकास नहीं होना उन्हें सामाजिक एवं मानसिक रूप से तनावग्रस्त बना देती हैं,जो उनके स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक सिद्ध होती हैं।उन्हें घर -परिवार,स्त्री - समाज में लज्जा महसूस होती है।साथ ही हीन भावना से ग्रसित होकर चिंतित रहती हैं,जिसका उनके स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डालती है।

लक्षण :- स्तनों का ढीला होना,आकार में छोटा होना,स्तनों में कठोरता का अभाव होना,स्तनों का अविकसित होना,स्तनों की गोलाई कम होना आदि स्तनों के ढीलापन के प्रमुख लक्षण हैं।

कारण :- शारीरिक कमजोरी,अत्यधिक सहवास,मासिक धर्म का अनियमित होना,बुखार रहना,स्तनों को पुष्ट करने वालों है हार्मोन्स की कमी,कुपोषण,पौष्टिक आहारों का असंतुलित उपयोग आदि स्तनों के ढीलेपन के मुख्य कारण हैं।

उपचार :-  (1) गाय का घी,काले तिल,निशोथ,बच एवं सोंठ को मिलाकर पीस लें और आधा किलो तिल के तेल में पकाकर रख लें।प्रतिदिन 

                    सुबह-शाम तेल की मालिश से स्तन पुष्ट एवं सुडौल हो जाता है।

(2) जैतून के तेल में थोड़ी सी फ़िटकरी पीसकर मिलाकर मालिश करने से स्तन पुष्ट एवं सुडौल हो जाता है।

(3) अनार के छिलके को पानी के साथ पीसकर उसमें चार ग्राम हल्दी मिलाकर पेस्ट बना लें और निप्पल को छोड़कर बांकी हिस्सों पर लेप लगाएं ।ऐसा करने से कुछ ही दिनों में स्तनों का ढीलापन ठीक हो जाता है।

(4) बरगद के दूध से स्तनों की मालिश करने से भी स्तनों का ढीलापन ठीक हो जाता है।

(5) माजूफल को पीसकर शहद में मिलाकर स्तनों पर लेप करने से स्तनों का ढीलापन ठीक हो जाता है।

(6) एक अंडा,पांच ग्राम वेसन,पांच ग्राम नीम्बू का रस सबको दूध के साथ मिलाकर स्तनों पर लेप करने से स्तनों का ढीलापन ठीक हो जाता है।

(7)एरंड के पत्तों को पीस लें और उसमें गन्ने का रस सिरका मिलाकर लेप करने से स्तनों का ढीलापन ठीक हो जाता है।

(8) राई को पीस कर स्तनों पर लेप लगाने से स्तनों का ढीलापन ठीक हो जाता है। 


vaginal dryness

योनि का सूखापन :- जन्म से लेकर आयु के अधिक होने के दौरान अलग -अलग परिवर्तन आना प्रकृति का नियम है। स्त्रियों में योनि का सूखापन महसूस करना भी एक ऐसा ही परिवर्तन है।वास्तव में स्त्रियॉं रजोनिवृत्ति की अवस्था में पहुँचने के बाद अक्सर योनि में सूखापन अनुभव करने लगती है और सम्भोग के दौरान अत्यंत कष्ट का अनुभव करती हैं।वास्तव में योनि की दीवारों पर एस्ट्रोजन की मदद से तरल पदार्थ का स्राव होता हैं और सम्भोग क्रिया को आनंदप्रद बनाती हैं। किन्तु जब एस्ट्रोजन हार्मोन की कमी हो जाती हैं तो योनि में सूखापन की स्थिति हो जाती हैं।

लक्षण :- योनि के अंदर एवं आसपास खुजली होना,सम्भोग के समय अत्यंत कष्ट होना,सम्भोग की इच्छा में कमी,बार-बार यूरिन त्याग करना,सम्भोग के दौरान रक्त आना,योनि में इंफेक्शन होना,बार-बार यूरिनल इंफेक्शन होना आदि योनि के सूखापन के प्रमुख लक्षण हैं।

कारण :- रजोनिवृत्ति,एस्ट्रोजन हार्मोन की कमी,शिशु के जन्म के समय,तनावपूर्ण जीवनशैली,धूम्रपान,अत्यधिक शराब का सेवन,शरीर के गर्भाशय का निकल जाना,रोग प्रतिरोधक शक्ति में कमी होना,कैंसर के इलाज में कीमोथेरेपी के कारण,दवाओं का प्रतिकूल प्रभाव,योनि में सुगन्धित स्प्रे आदि योनि के सूखापन के मुख्य कारण हैं।

उपचार :-  (1) दैनिक आहार में सोडियम,पोटेशियम,कैल्सियम,प्रोटीन युक्त आहारों के सेवन द्वारा योनि में नमी प्राकृतिक रूप से बनाये रख 

                    सकते हैं।

               (2) दैनिक आहार में सोया उत्पाद,अलसी के बीज,मेथी के बीज आदि के नियमित सेवन से योनि के सूखापन को दूर किया जा 

                    सकता हैं।

               (3) फैटी एसिड,ओमेगा -3  आदि को आहार में शामिल करने से योनि का सूखापन दूर हो जाता हैं।

               (4) कच्चा पपीता,सफ़ेद टिल,सूरजमुखी के बीज आदि के नियमित सेवन से योनि के सूखापन को दूर किया जा सकता हैं।

               (5) मांसाहारी आहार सेलोमन मछली के सेवन से योनि के सूखेपन से बचा जा सकता हैं।

               (6) नियमित व्यायाम करने से रक्त का संचरण समुचित रूप में होने से योनि का सूखापन प्राकृतिक रूप से दूर हो जाता हैं।


loose of vagina

योनि का ढीलापन :- योनि का ढीलापन एक आम समस्या है ,जो बच्चों को जन्म देने या सेक्स में अधिक लिप्त रहने के कारण आता है।वास्तव में मानव शरीर प्रकृति द्वारा प्रदत्त स्त्री व पुरुष दोनों के लिए एक अनुपम भेंट है।फिर अगर हम सेक्स अंगों की बात करें तो प्राकृतिक रूप में अत्यधिक आनंद देने वाला होता है।योनि स्त्री का एक अद्भुत एवं प्रमुख आकर्षक अंग है और सम्भोग के दौरान प्राकृतिक रूप से स्त्री एवं पुरुष दोनों जो अद्भुत आनंद की प्राप्ति होती है,उसमें योनि का विशेष योगदान है।किन्तु संतानोत्पत्ति के पश्चात उनमें ढीलापन आ जाने से सम्भोग के दौरान आनंद में कमी आ जाती है।योनि में ढीलापन योनि की तंतुओं में ढीलापन आ जाना की वजह से होता है।

लक्षण :- योनि का फ़ैल जाना,योनि के दीवारों की तंतुओं का ढीला हो जाना,योनि के तंतुओं में कसाव कम हो जाना,सम्भोग के समय आनंद में कमी,योनि में कसाव कम हो जाना,सम्भोग करते समय लिंग का योनि की दीवारों से घर्षण कम होना आदि योनि के ढीलापन के प्रमुख लक्षण हैं।

कारण :- शारीरिक दुर्बलता,अप्राकृतिक सम्भोग,प्रसव,सेक्स के विभिन्न आसनों का प्रयोग,अश्लील फिल्में देखकर सम्भोग करना,योनि स्राव में अधिकता,योनि की दीवारों के तंतुओं का ढीला हो जाना आदि योनि के ढीलापन के मुख्य कारण हैं।

उपचार :- (1) फिटकरी को पानी में घोलकर उस पानी से योनि को धोने से कुछ ही दिनों में योनि में कसाव आ जाता है और उसका ढीलापन 

                   दूर हो जाता है।

(2) फिटकरी,दालचीनी,जायफल समान भाग लेकर पीसकर चूर्ण बनाकर प्रतिदिन रात में सोते समय योनि पर लगाकर सोने से कुछ ही दिनों           

     में योनि का ढीलापन ठीक हो जाता है।

(3) दो तीन ग्राम सुपारी पाक गुनगुने दूध के साथ सेवन करने से योनि का ढीलापन ठीक हो जाता है।

(4) शहद,कपूर और माजूफल के साथ मिलाकर प्रतिदिन योनि की मालिश करने से योनि का ढीलापन दूर हो जाता है। 

(5) पालक के बीज,गूलर के फल को शहद एवं तिल के तेल के साथ पीसकर पेस्ट बनाकर योनि पर लेप करने से योनि का ढीलापन ठीक हो 

      जाता है।

(6) आंवला के पेड़ की छाल रात में पानी में भिगोकर रखें और सुबह उस पानी से योनि को धोने से योनि का ढीलापन ठीक हो जाता है।

(7) मलमल के कपडे में भांग रखकर एक पोटली बनाकर योनि के अंदर रात में रख दें और सुबह निकाल दें।ऐसा कुछ दिनोतक तक करने से 

     योनि एकदम कुंवारी लड़की की तरह हो जाती है।

(8) बेंट के जड़ के काढ़े से योनि को धोने से योनि का ढीलापन दूर हो जाता है।a(9) अशोक के वृक्ष की छाल के काढ़े से योनि को धोने से योनि का ढीलापन दूर हो जाता है।

(10) चार ग्राम काले तिल का पाउडर,आठ ग्राम गोखरू का चूर्ण,सोलह ग्राम शहद मिलाकर एक गिलास दूध के साथ प्रतिदिन सेवन करने से योनि का ढीलापन दूर होकर संकुचित हो जाता है।

(11) एलोवेरा के सेवन से योनि की दीवारों में संकुचन पैदा होने से योनि का ढीलापन ठीक हो जाता है।

(12) पलाश के वृक्ष की छाल के काढ़े से योनि को धोने से योनि का ढीलापन दूर हो जाता है।


breast cancer

स्तन कैंसर रोग :- स्तन कैंसर महिलाओं को होने वाला एक आम खतरनाक बीमारी है,जो स्तन की कोशिकाओं में होता है।स्तन के सूक्ष्म वाहिनियों,फाइब्रस मैटेरियल,फैट नाडियों,रक्त वाहिकाएं एवं कुछ लिम्फेटिक चैनलों में गतिरोध आ जाना स्तन कैंसर का प्रमुख कारण हैं ।प्रारंभ में स्तन कैंसर डक्ट में छोटे कैल्सिफिकेशन (सख्त कण) के जमने से या स्तन के टिश्यू में छोटी गांठ के रूप में बनते हैं और कैंसर का रूप धारण कर लेते हैं।स्तन कैंसर में स्तन में गांठ,निपल से खून मिला हुआ रिसाव एवं निपल या स्तन की बनावट में परिवर्तन आ जाता है।

लक्षण :- स्तन में गांठ,निपल से खून मिला हुआ रिसाव,निपल के बनावट में परिवर्तन,असहजता,स्तन में दर्द,सूजन,चुचुक में परिवर्तन जैसे अंदर खिंच लिया गया हो आदि स्तन कैंसर के प्रमुख लक्षण हैं।

कारण :- स्तन की कोशिकाओं का अनियंत्रित वृद्धि,आनुवांशिक कारण,दुग्ध वाहिनी में अवरोध,चोट लगने,बढ़ती उम्र,शराब का सेवन,धूम्रपान,रेडिएशन उपचार,एस्ट्रोजेन हार्मोन में वृद्धि आदि स्तन कैंसर मुख्य कारण हैं।

उपचार :- (1)  नमक,सोंठ,शमी,मूली,सरसों एवं सहजन के बीज समान मात्रा में लेकर खट्टे छाछ में पीसकर स्तनों 

                     पर लेप करने से स्तन कैंसर ठीक हो जाता है।

(2) आंवला का सेवन प्रतिदिन सुबह शाम करने से स्तन कैंसर ठीक हो जाता है।

(3) पोइ के पत्तों को पीसकर स्तन पर लेप करने से स्तन कैंसर ठीक हो जाता है।

(4) हर्बल ग्रीन के सेवन से भी स्तन कैंसर को समाप्त किया जाता है।

(5) अंगूर एवं अनार के जूस का प्रतिदिन सुबह शाम सेवन स्तन कैंसर में बहुत आराम होता है।

(6) काली चाय का प्रतिदिन सेवन करने से भी स्तन कैंसर की बीमारी ठीक हो जाती है।

(7) सदाबहार के फूलों का सेवन प्रतिदिन करने से भी स्तन कैंसर ठीक हो जाता है।


menopause

रजोनिवृत्ति  :- रजोनिवृत्ति महिलाओं के जीवन की वह अवस्था है ,जब एस्ट्रोजेन और प्रोजेस्ट्रोन हार्मोन का स्तर शरीर में काम हो जाता है।ज्यों-ज्यों हार्मोन का स्तर काम होता जाता है मासिक धर्म काम होते जाते हैं और अंततोगत्वा मासिक धर्म बंद हो जाता है।परिणामस्वरूप महिलाएं शरीर व व्यवहार में बहुत अधिक बदलाव महसूस करती हैं ।रजोनिवृत्ति एक प्राकृतिक प्रक्रिया है ,जो प्रत्येक महिलाओं के जीवन में एक बार अवश्य आता है और उनके जीवन में उथल-पुथल मचा देता है ।

लक्षण :- गर्मी लगना,पसीना आना,उत्तेजित होना,नींद न आना,मानसिक स्थिति में उतार-चढ़ाव,सिरदर्द,योनि में रूखापन,यौनेच्छा में 

            कमी,सम्भोग के दौरान दर्द,त्वचा व बालों में रूखापन आना,वजन बढ़ना,मूत्रमार्ग में संक्रमण,पेशाब में वृद्धि,जोड़ों में दर्द,बालों का 

            गिरना,स्मरण शक्ति कमजोर हो जाना आदि रजोनिवृत्ति के प्रमुख लक्षण हैं।

कारण :- हार्मोन्स एस्ट्रोजेन एवं प्रोजेस्ट्रोन का काम हो जाना,अंडाशय के स्वास्थ्य में कमजोरी,श्रोणि चोटें,अंडाशय के शल्य क्रिया द्वारा हटाया 

             जाना आदि रजोनिवृत्ति के मुख्य कारण हैं ।

जटिलताएं :- योनि के अस्तर का पतला हो जाना,दर्दनाक सम्भोग,मूत्र की अधिकता,ह्रदय रोग की संभावना,चयापचय में कमी,हड्डी कमजोर हो 

                  जाना,मोतियाबिंद,मनोदशा में परिवर्तन आदि आ जाना ।

उपचार :- (1) कैल्सियम आधारित खाद्य पदार्थों का प्रयोग अधिक मात्रा में करने से रजोनिवृत्ति में बहुत राहत प्रदान करती हैं ।

              (2) अनिद्रा के लिए व्यायाम -कसरत पर ज्यादा जोर देना ताकि थकान हो ताकि नींद आ सके या नींद की गोली का प्रयोग कर भी 

                   आराम से नींद आ सके ।

              (3) रजोनिवृत्ति के प्रभाव को कम करने के लिए नियमित व्यायाम करने की आदतों को डालने से इसके प्रभाव को कम किया जा 

                    सकता है ।

              (4) रजोनिवृत्ति के प्रभाव को कम करने के लिए पूरक आहार जैसे विटामिन डी,मैग्नेशियम,अलसी सोया मेलाटोनिन,विटामिन ई 

                   आदि से युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन ।

              (5) नॉन हार्मोनल वजाइनल मॉइश्चराइजर और लुब्रिकेंट का उपयोग द्वारा भी इससे होने वाले दुष्प्रभाव को कम किया जा सकता है।

              (6) रजोनिवृत्ति के प्रभाव को कम करने के लिए त्वचा की देखभाल से भी इससे उत्पन्न समस्या से मुक्ति प् सकते हैं ।

              (7) अच्छी नींद लेकर भी रजोनिवृत्ति से होने वाली समस्या से बचा जा सकता है ।

              (8) रजोनिवृत्ति के प्रभाव को कम करने के दौरान धूम्रपान एवं शराब के सेवन न कर  इसके दुष्प्रभाव को रोका जा सकता  है। 


dysmenorrhea disease

कष्टार्तव रोग :- कष्टार्तव स्त्रियों का एक अत्यंत कष्टदायक बीमारी है।मासिक धर्म के दौरान स्त्रियाँ मामूली दर्द का अनुभव करती हैं ;किन्तु जब असहनीय दर्द के कारण क्रियाकलाप में बाधा उत्पन्न होने लगती है या इलाज की आवश्यकता पड़ जाती है तो इसे कष्टार्तव रोग के नाम से जाना जाता है।कष्टार्तव में माहवारी के दौरान महिलाएं गर्भाशय में असहनीय पीड़ा का अनुभव करती हैं।कष्टार्तव मासिक धर्म के कई दिनों पूर्व से हो सकता है या उसके साथ हो सकता है और मासिक धर्म के समाप्त होते ही धीरे-धीरे काम होकर समाप्त हो जाता है। 

प्रकार :- यह तीन प्रकार के होते हैं - (1) आसंकुचन जन्य कष्टार्तव:- यह गर्भाशय में संकोच के कारण होता है ।यह 13 -18 वर्ष की उम्र में 

                                                       ज्यादा होता है।

                                                 (2) झिल्ली जन्य :- गर्भाशय के अंदर की झिल्ली गर्भाशय से बाहर आ जाती है। 

                                                 (3) रक्ताधिक्य कष्टार्तव :- मासिक स्राव के रक्त में अस्वाभाविक बढ़ोतरी के कारण होता है ।

लक्षण :-पेट के निचले भाग में दर्द,नाभि के आसपास दर्द,पेट के दाहिने या बायीं ओर दर्द,उल्टी,दस्त,कब्ज,सिरदर्द चक्कर आना,ध्वनि,प्रकाश,  

            गंध के प्रति अतिसंवेदनशीलता, मूर्च्छा,थकान आदि कष्टार्तव के प्रमुख लक्षण हैं ।  

कारण :- प्रोस्टाग्लैंडिन का स्तर बढ़ जाना, गर्भाशय में संकुचन,प्रीमेंस्ट्रुअल सिंड्रोम के कारण,गर्भाशय में फाइब्रॉएड,श्रोणिसूजन की 

             बीमारी,एडिनोमायोसिस ( गर्भाशय की दीवार के अंदर वृद्धि ),गर्भाशय का छोटा होना,आनुवंशिक कारण,उम्र से पहले युवावस्था तक 

              पहुंचना आदि कष्टार्तव के मुख्य कारण हैं ।

उपचार:-   (1) अशोक की छाल पांच ग्राम की मात्रा लेकर आधा लीटर पानी में उबालें और छानकर प्रतिदिन सुबह -शाम सेवन करने से 

                     कष्टार्तव रोग दूर हो जाता है ।

               (2) त्रिफला चूर्ण चार ग्राम की मात्रा गुनगुने जल के साथ रात्रि सोते समय प्रतिदिन लेने से कष्टार्तव रोग का नाश हो जाता है ।

               (3) टंकण भस्म यानि सुहागा भस्म,प्रवाल पिष्टी,अशोक चूर्ण एवं चंद्रप्रभावटी का उपयोग कष्टार्तव में अत्यंत उपयोगी है ।

               (4) अजवाइन चूर्ण 50 ग्राम,गाय का घी 50 ग्राम,गुड़ 100 ग्राम ; पहले कढ़ाही में घी डालकर उसमें अजवाइन चूर्ण एवं गुड़ 

                     डालकर मिलाएं और उतारकर प्रातः काल रोगिणी को खिला दें ।यह तीन-चार दिनों तक प्रयोग करने से कष्टार्तव रोग ठीक हो 

                      जाता है ।

               (5) काले तिल कपास की कोपलें,बांस की कोपलें 200 ग्राम लेकर महीन चूर्ण बनाकर पुराने गुड़ में मिलाकर गूलर के समान गोली 

                     बनाकर रख लें और प्रतिदिन एक -एक गोली सुबह-शाम गर्म जल के साथ सेवन करने से कष्टार्तव रोग का नाश हो जाता है ।


metrorrhagia disease

रक्त प्रदर रोग :- मासिक धर्म महिलाओं को होने वाला एक स्वाभाविक क्रिया है।जब गर्भाशय से रक्त स्राव असामान्य रूप से मासिक धर्मों के बीच में होने लगे तो इसे रक्त प्रदर की बीमारी कहा जाता है । रक्त प्रदर रोग में अधिक दिनों तक और अधिक मात्रा में रजःस्राव होता है,जिससे महिलाएँ रक्त की कमी एवं दुर्वलता की शिकार हो जाती हैं।रक्त प्रदर में माहवारियों के बीच गर्भाशय से रक्तस्राव कुछ सप्ताह में होता है और प्रवाह सामान्य से बहुत अधिक होता है।रक्त प्रदर महिलाओं के लिए अत्यंत कष्टप्रदायक स्थिति है;इसलिए तुरंत चिकित्सक से सलाह लेनी चाहिए।

लक्षण :- पेट दर्द या ऐंठन,नियमित मासिक धर्म के बीच भरी रक्तस्राव,गर्भाशय में दर्द,आँखों के सामने अँधेरा छा जाना,चक्कर आना,नींद एवं आलस्य,शरीर गर्म रहना,ज्यादा प्यास लगना,कमर में दर्द,योनि के ऊपरी हिस्से में दर्द आदि रक्त प्रदर के प्रमुख लक्षण हैं ।

कारण :- हार्मोनल असंतुलन,गर्भनिरोधक गोलियों का प्रयोग,फाइब्रॉएड,गर्भाशय ग्रीवा या योनि की सूजन,गर्भाशय में संक्रमण,कैंसर,यौन 

             संचारित संक्रमण,गर्भपात के कारण,अस्थानिक गर्भावस्था,मधुमेह,थायराइड,खमीर संक्रमण आदि रक्त प्रदर के मुख्य कारण हैं ।

उपचार :- (1) बबूल या कीकर की कच्ची फली का चूर्ण ताजे जल के साथ सुबह - शाम सेवन  करने से सभी प्रकार के प्रदर का नाश हो 

                    जाता है। यह अत्यंत प्रामाणिक एवं निरापद है ।

               (2) अशोक की छाल 100 ग्राम, सफ़ेद चन्दन,कमल का फूल,धाय का फूल,अतीस,आंवला,नागरमोथा,जीरा और चहेते की छाल 

                     50 -50 ग्राम लेकर कूट पीस कपड़छान कर चूर्ण बनाकर दश ग्राम की मात्रा लेकर उसमें सामान भाग मिश्री मिलाकर खाने 

                     और ऊपर से चावल का पानी पाई से रक्त एवं श्वेत दोनों प्रकार के प्रदर का नाश शत प्रतिशत हो जाता है।

                (3) सोंफ और सोंठ दश -दश ग्राम,ऊन की रख,और आंवला बीस-बीस ग्राम,नागकेशर पांच ग्राम और मिश्री 100 ग्राम कूट पीस 

                    कपड़छान कर चूर्ण बनाकर पांच ग्राम की मात्रा प्रतिदिन सुबह-शाम धारोष्ण जो दूध के साथ सेवन करने से सभी प्रकार के प्रदर 

                    का नाश हो जाता है।यह शत प्रतिशत अनुभूत एवं निरापद है ।

                (4) नागकेशर,खस पठानी,लोधा आंवला,100 -100 ग्राम,माजूफल और अशोक की छाल 100 ग्राम,पीपल की लाख 200 ग्राम 

                      कूट पीस कपड़छान कर चूर्ण बनाकर प्रतिदिन सुबह-शाम पांच ग्राम की मात्रा दूब के रस के साथ सेवन करने से रक्त प्रदर 

                       का नाश हो जाता है ।

                 (5) पीपल की लाख,नागरमोथा और सोना गेरू पांच-पांच ग्राम,बबूल का गोंद,रसोंत शुद्ध और दारु हल्दी 10 -10 ग्राम,मिश्री 20 

                       ग्राम सबको कूट पीस कपड़छान कर चूर्ण बनाकर प्रतिदिन सुबह-शाम 4 ग्राम की मात्रा  बकरी के दूध के साथ सेवन करने 

                       से रक्त प्रदर का समूल नाश हो जाता है।

                  (6) गूलर का फल (कीड़ा रहित) कूट पीस कपड़छान कर प्रतिदिन प्रातः काल पांच  ग्राम की मात्रा शहद के साथ सेवन करने से 

                        रक्त प्रदर का नाश हो जाता है।


menorrhagia disease

अत्यार्तव रोग :- के कारण होनेमहिलाओं में मासिक धर्म  वाला रक्तस्राव  सामान्य प्रक्रिया है,जो तीन-चार दिनों तक होता है ।किन्तु जब बहुत अधिक रक्तस्राव कोई बीमारी या अन्य कारणों से होता है तो इसे अत्यार्तव या भारी माहवारी रक्तस्राव के नाम से जाना जाता है।अत्यार्तव रोग में माहवारी के साथ योनि से लम्बे समय तक या बहुत अधिक मात्रा में रक्त का स्राव होता है। यह बहुत ही कष्टप्रदायक स्थिति महिलाओं के लिए होता है।इसका उनके स्वास्थ्य पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है।

लक्षण :- पेट में दर्द,निचली कमर का दर्द,स्तनों में दर्द,चिड़चिड़ापन,सिरदर्द,थकान,सप्ताह से ज्यादा रक्तस्राव,खून की कमी,श्रोणि का अधिक 

            दर्द,भूख की ज्यादा इच्छा,साँस की तकलीफ होना आदि अत्यार्तव के प्रमुख लक्षण हैं।

कारण :- हार्मोनल असंतुलन,गर्भाशय फाइब्रॉएड,जीवाणु,गर्भनिरोधक उपकरण का प्रयोग,ग्रंथिपेशियों में कैंसर,गर्भाशय की  

             जटिलताएँ,थॉयराइड आदि अत्यार्तव के मुख्य कारण हैं।

उपचार :- (1) बबूल या कीकर की कच्ची फली का चूर्ण प्रतिदिन सुबह -शाम ताजे जल केa साथ सेवन करने से अत्यार्तव की बीमारी नष्ट हो 

                   जाती है। यह एकदम शत -प्रतिशत प्रामाणिक है तथा इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं है ।

              (2) अडूसा,पित्तपापड़ा,खिलैटी,नीलोफर,लाल चन्दन,नीम की छाल,चार-चार ग्राम लेकर जौकूट कर आधा लीटर पानी में भिगों दें । 

                    तीन घंटे के बाद मल - मलकर छानकर रख लें और दो-दो घंटे के अंतराल पर पिलाने से अत्यार्तव रोग का नाश हो जाता है।

              (3) बादाम की गिरी पांच,छुआरा दो,रात को पानी में भिगों दें और सुबह बादाम का छिलका तथा छुआरे की गुठली निकालकर 

                   अलग-अलग पीस लें और उसमें केशर पांच ग्राम एवं मक्खन देश ग्राम मिलकर बासी मुँह कुछ दिन खिलाने से अत्यार्तव रोग का 

                   नाश हो जाता है ।

              (4) नागकेशर पांच ग्राम,मुक्त भस्म,बच्छनाग भस्म और संगजराहट भस्म एक-एक ग्राम । नागकेशर को बारीक चूर्ण बनाकर उसमें 

                   भस्में मिलाकर खरल कर आठ बराबर भागों में पुड़िया बना लें ।एक-एक पुड़िया सुबह-शाम सेवन करने से अत्यार्तव रोग का 

                    नाश हो जाता है ।

              (5) सफ़ेद बच 25 ग्राम कूट पीसकर चूर्ण बनाकर सुबह-दोपहर-शाम एक ग्राम की मात्रा ताजे ठन्डे जल के साथ सेवन करने से 

                   अत्यार्तव रोग का नाश हो जाता है ।

              (6) विदारीकंद चूर्ण एक चम्मच घी और शक्कर के साथ सुबह-शाम चाटने से अत्यार्तव रोग दूर हो जाता है।


puerperal fever

प्रसूतिका ज्वर:- प्रसूतिका ज्वर स्त्रियों को होने वाली एक अत्यंत खतरनाक एवं घातक रोग है।यह रोग एक प्रकार के जीवाणु या जहर के कारण होता है।प्रसूतिका या सूतिका ज्वर प्रसव के पहले या प्रसव के उपरांत महिलाओं को होने वाला एक बीमारी है।यह गर्भाशय में नारवेल का कुछ अंश रह जाने की वजह से होता है।यह बुखार बच्चों के जन्म देने के बाद तीन -चार दिन बाद होता है।प्रसूति काल में गर्भाशय में रक्त में विष प्रविष्ट हो जाने या दूषित कीटाणु के संक्रमण की वजह से होता है।

लक्षण :- सर दर्द,नाड़ी की गति तेज हो जाना,पेट दर्द,बुखार,पसीना न आना,स्तनों में दूध न आना,अरुचि,अनिद्रा,चक्कर आना,पेशाब का पीलापन आदि प्रसूतिका ज्वर के प्रमुख लक्षण हैं।

कारण:- प्रसव के समय साफ -सफाई का ध्यान न रखना,गर्भ नाल काटते वक्त नाख़ून का लग जाना,बैक्टीरिया का संक्रमण होना,गर्भनाल के कुछ अंश का अंदर रह जाना आदि प्रसूतिका ज्वर के मुख्य कारण हैं।

उपचार :- (1) पीपल,पीपलामूल,काली मिर्च,सोंठ,अजमोद,भारंगी,हींग,इंद्रा जौ सबको मिलाकर काढ़ा बनाकर प्रतिदिन सुबह -शाम पीने से 

                    प्रसूतिका ज्वर ठीक हो जाता है।

              (2) पीपल,सोंठ,पीपलामूल,अजवाइन हल्दी सबको समान भाग लेकर काढ़ा बनाकर प्रतिदिन सुबह -शाम पीने से प्रसूतिका ज्वर का 

                   नाश हो जाता है।

              (3) दालचीनी,सोंफ,धनिया,बेलगिरी समान भाग लेकर काढ़ा बनाकर प्रतिदिन सुबह- शाम पीने से प्रसूतिका ज्वर नष्ट हो जाता है।

              (4) द्राक्षा,नागकेशर,काली मिर्च,तमालपत्र,छोटी इलायची,पीपर समान भाग लेकर चूर्ण बनाकर चार -पांच ग्राम की मात्रा ताजे जल 

                   के साथ सेवन करने से प्रसूतिका ज्वर का नाश हो जाता है।

              (5) चन्दन की लकड़ी,तिन्तुक फल,मुस्तकमूल,क्षीरकाकोली मूल और बचाकन्द समान भाग लेकर काढ़ा बनाकर प्रतिदिन सुबह - 

                    शाम पीने से प्रसूतिका ज्वर नष्ट हो जाता है।

               (6) कुठफल,देवदारु,गुग्गुल एवं घी के सेवन से प्रसूतिका ज्वर नष्ट होता है।


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