blood cancer

रक्त कैंसर रोग :- रक्त कैंसर एक अत्यंत खतरनाक एवं जानलेवा बीमारी है ,जो रक्त कैंसर कोशिकाओं में उत्परिवर्तन के कारण शुरु होता है।यह प्रारम्भ में खून या अस्थिमज्जा में होता है और रक्त में धीरे - धीरे फैलती है एवं रक्त बनाने वाले ऊतकों का कैंसर संक्रमण से लड़ने की शरीर की क्षमता क्षीण हो जाती है।वास्तव में रक्त कैंसर से ग्रसित व्यक्ति बार - बार संक्रमण की चपेट में आ जाता है एवं कई तरह की बीमारियों से ग्रसित हो जाता है। अंततः गंभीर स्थिति में मृत्यु के करीब पहुँच जाता है। 

रक्त कैंसर के प्रकार :- (1) ल्यूकेमिया :- यह हमारे शरीर के सफ़ेद रक्त कोशिकाओं को प्रभावित करता है।

(2) लिम्फोमा :- यह लिम्फैटिक प्रणाली को प्रभावित करता है  जो शरीर को रोग एवं संक्रमण से बचाती है ।

(3) मल्टीपल मायलोमा :- प्लाज्मा कोशिकाओं को प्रभावित करता है जो रोगों से लड़ने में सहायता करता है ।

लक्षण :- बुखार ,चक्कर आना ,रात में पसीना आना , हड्डियों एवं जोड़ों में दर्द , बार -बार संक्रमण , वजन कम होना , रोग प्रतिरोधक शक्ति का कम हो जाना , थकान , मल में खून आना , जी मिचलाना , त्वचा पर लाल चकत्ते , कमजोरी आदि रक्त कैंसर के प्रमुख लक्षण हैं।

कारण :- रेडिएशन के संपर्क में आना , कीमोथेरेपी, रासायनिक पदार्थों के संपर्क में आना , संक्रमण , आनुवांशिक , उम्र बढ़ना , धूम्रपान आदि रक्त कैंसर के मुख्य कारण हैं।

उपचार :- (1) नोनी फल के जूस का प्रतिदिन सुबह - शाम 20 मिलीलीटर की मात्रा सेवन करने से रक्त कैंसर ठीक होता है।

(2) अम्बा हल्दी , दारू हल्दी एवं हल्दी समान भाग लेकर चूर्ण बना लें और प्रतिदिन सुबह - शाम एक गुनगुने दूध के साथ सेवन करने से रक्त कैंसर ठीक हो जाता है ।

(3) गेंहूं के ज्वारे का रस गिलोय रस घृतकुमारी रस गोधन अर्क एवं नीम के पत्ते का रस तुलसी के पत्ते सबको मिलाकर 25 - 25 एम एल की मात्रा सुबह - शाम सेवन करने से रक्त कैंसर ठीक हो जाता है ।

(4) देशी गाय के मूत्र को आठ परत वाली कॉटन की चादर से छानकर उसमें हल्दी मिलाकर उबालें और आधा शेष रहने पर घूंट - घूंट पीने से रक्त कैंसर समूल नष्ट हो जाता है ।

(5) अंगूर के बीजों का सत्व या अर्क के सेवन से रक्त कैंसर समूल नष्ट हो जाता है ।

(7) नागफनी के गूदे के रस की दो - तीन ग्राम की मात्रा सुबह - शाम पीने से रक्त कैंसर ठीक हो जाता है ।

(8) नागदोन के पत्ते को पीसकर रस निकालकर दो - तीन ग्राम सेवन करने से रक्त कैंसर दूर हो जाता है ।

(9) सदाबहार के फूलों के रस की दो -तीन ग्राम की मात्रा सुबह - शाम सेवन करने से रक्त कैंसर ठीक हो जाता है ।


gaucher disease

गॉचर रोग :- गॉचर एक दुर्लभ किस्म की बीमारी है,जिसका इलाज काफी महंगा है।इस बीमारी में शरीर में खून की मात्रा कम होना शुरू हो जाता है और साथ ही प्लेट्सलेट्स भी कम होने लगता है। परिणामस्वरूप लिवर का आकार बढ़ जाता है और लंग्स कमजोर होने लगता है।इस बीमारी में कुछ मरीजों के दिमाग पर भी प्रभाव पड़ता है और दौरे आने लगता है।इस दुर्लभ बीमारी के उपचार में प्रयोग होने वाले एंजाइम रिप्लेसमेंट थेरेपी के एक इंजेक्शन की कीमत एक लाख से अधिक होती है और प्रत्येक दो हफ्ते में एक इंजेक्शन दिया जाता है।हरेक व्यक्ति के लिए इस दुर्लभ गॉचर बीमारी का इलाज करा पाना अत्यंत कठिन होता है।वास्तव में गॉचर रोग विरासत में मिला हुआ एक दुर्लभ किस्म का खतरनाक रोग है।

लक्षण :- किस्म 1 :- त्वचा में बदलाव,प्लेट्सलेट्स कम होना,हड्डी का दर्द,गठिया,फ्रेक्चर,संज्ञानात्मक बधिरता,जिगर का बढ़ जाना,थकान,हृदय के वाल्व में विकार हो जाना आदि ।

किस्म 2 :- तिल्ली का बढ़ जाना,निगलने में परेशानी,वजन का स्थिर हो जाना,निमोनिया आदि ।

किस्म 3 :- आँखों को हिलाने-डुलाने में परेशानी,फेफड़ों की बीमारी का हो जाना,मानसिक परेशानी,हाथों और पैरों को कंट्रोल नहीं कर पाना,मांसपेशियों में ऐंठन होना आदि गॉचर रोग के प्रमुख लक्षण हैं।

कारण :- आनुवंशिक,जी बी ए जीन में बदलाव होने आदि गॉचर रोग के मुख्य कारण हैं।

उपचार :- (1) अश्वगंधा पाउडर के नित्य प्रतिदिन सेवन करने से गॉचर रोग से उत्पन्न मानसिक विकार को दूर किया जा सकता है , साथ ही  बढ़ने से रोका जा सकता है।

(2) शरीर की इम्युनिटी को बढ़ा कर इस दुर्लभ बीमारी को रोका जा सकता है।इसके लिए महासुदर्शन चूर्ण का सेवन प्रतिदिन सुबह शाम सेवन करें।

(3) गिलोय, तुलसी के पत्ते,काली मिर्च,अदरक को एक गिलास पानी में उबालें और एक चौथाई शेष रहने पर सुबह शाम सेवन करने से भी शरीर में इस दुर्लभ बीमारी से लड़ने की शक्ति प्राप्त होती है।

(4) सहदेवी के पौधे का पंचांग का काढ़ा बनाकर पीने से भी गॉचर रोग से उत्पन्न लिवर की विकृति को ठीक किया जा सकता है।

(5) अश्वगंधा,शतावर,सोंठ,एवं सुरंजन के चूर्ण के सेवन से गॉचर रोग से उत्पन्न गठिया एवं हड्डी के फ्रेक्चर को ठीक किया जा सकता है।

(6) गॉचर रोग से उत्पन्न विकृति दौरे पड़ना जैसी समस्या को कंटकारी के पौधे के रस की दो तीन बूंदे नाक में डालने से दौरे बंद हो जाता है।

(7) गॉचर रोग की विकृति से उत्पन्न ह्रदय के वाल्व का बढ़ जाना आया अन्य विकृति को अर्जुन वृक्ष की छाल एवं अश्वगंधा की जड़ का काढ़ा सुबह शाम पीने से इस रोग को दूर किया जा सकता है।


multiple myeloma disease

 मल्टीपल माइलोमा रोग :-  मल्टीपल माइलोमा रक्त का एक अत्यंत गंभीर रोग है,जिसे प्लाज्मा सेल्स का कैंसर भी कहा जाता है।वास्तव में यह एक प्रकार का कैंसर होता है,जो सफ़ेद रक्त कोशिका में होता है।जिसे प्लाज्मा सेल भी कहा जाता है।प्लाज्मा सेल आपको संक्रमण से लड़ने में मदद करते हैं और बाहरी रोगाणुओं को पहचान कर समाप्त करता है,इसीलिए इसे शरीर के रक्षातंत्र के प्रमुख सिपाही के रूप में भी जाना जाता है। वास्तव में यह एक कारखाना है जहाँ रक्त में पायी जाने वाली सारी कोशिकाओं निर्माण होती है।जब रक्षातंत्र की कोशिकाएं बाहरी आक्रमण का मुकाबला करने में समर्थ नहीं होती हैं तो वे अनियंत्रित होकर विभाजित होकर गांठ का रूप ले लेते हैं।यही जब एक से अधिक हो जाती हैं तो इसे मल्टीपल माइलोमा कहा जाता है।दूसरे शब्दों में मल्टीपल माइलोमा के कारण ही कैंसर कोशिकाएं अस्थि मज्जा या बोनमैरो में जमा होने लगती है,जो गांठ के रूप में परिवर्तित हो जाती है। इसे मल्टीपल माइलोमा या बहु मज्जार्बुद के नाम से भी जाना जाता हैं।

लक्षण :- हड्डियां कमजोर होना,प्रतिरोधक शक्ति का कम होना,अस्थि ऊतक गलने लगना,हड्डियों का अचानक टूटना,दर्द,खून में कैल्सियम की मात्रा बढ़ने लगना,गुर्दे की विफलता,रक्त की कमी,थकान महसूस करना,भूख न लगना,कब्ज,वजन घटना,पीठ या पसलियों में दर्द,छोटी-मोती चोट से हड्डियों का टूट जाना,जल्दी-जल्दी संक्रमण एवं बुखार होना,ज्यादा प्यास लगना,जी मिचलाना,उलझन आदि मज्जार्बुद या मल्टीपल माइलोमा के प्रमुख लक्षण हैं।

कारण :- प्लाज्मा सेल्स का विकारग्रस्त होना,अस्थिमज्जा में गांठे हो जाना,लिम्फोसाइट में विकार आ जाना,कैंसर कोशिकाओं का असामान्य प्रोटीन पैदा करना,आनुवंशिक कारण,प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर हो जाना,अधिक आयु का होना आदि मज्जार्बुद या मल्टीपल माइलोमा के मुख्य कारण हैं।

उपचार :- (1) लहसुन का रस,अदरक का रस और शहद समान भाग मिलाकर सेवन करने से मल्टीपल माइलोमा 

                    ठीक हो जाता है।

              (2) हल्दी,अम्बा हल्दी एवं दारू हल्दी समान भाग लेकर चूर्ण बनाकर प्रतिदिन सुबह - शाम दूध के 

                    साथ सेवन करने से मल्टीपल माइलोमा ठीक हो जाता है।

              (3) अश्वगंधा चूर्ण,बच एवं दारू हल्दी के चूर्ण के प्रतिदिन सेवन करने से मल्टीपल माइलोमा ठीक हो 

                    जाता है।

              (4) एलोवेरा जूस का प्रतिदिन सेवन करने से एक मास में ही मल्टीपल माइलोमा रोग ठीक हो जाता है।

              (5) चुकुन्दर का रस एवं गाजर का रस प्रतिदिन पीने से मल्टीपल माइलोमा रोग ठीक हो जाता है।

              (6) गेहूं के ज्वारे का रस प्रतिदिन पीने से भी मल्टीपल माइलोमा ठीक हो जाता है।


anemia disease

रक्ताल्पता या एनीमिया रोग :-रक्ताल्पता एक गंभीर बीमारी है,जो अधिकतर महिलाओं को होता है।रक्ताल्पता तब होता है जब शरीर के रक्त में पर्याप्त स्वस्थ लाल रक्त कोशिकाएं या हीमोग्लोबिन नहीं होता है।हीमोग्लोबिन की मात्रा पुरुषों में 12 से 16 %और महिलाओं में 11 से 14 %के बीच होता है।महिलाओं में किशोरावस्था और रजोनिवृति के बीच की आयु में रक्ताल्पता सबसे अधिक होता है।रक्ताल्पता या एनीमिया की वजह से महिलाओं को अन्य बीमारियां होने की संभावना सबसे अधिक होती है।हीमोग्लोबिन के अणु में अनचाहे परिवर्तन आने से भी रक्ताल्पता के लक्षण परिलक्षित होते हैं।हमारे पूरे शरीर में हीमोग्लोबिन ही आक्सीजन को प्रवाहित करता है और इसकी संख्या में कमी आने से शरीर में आक्सीजन की आपूर्ति बाधित होती है फलस्वरूप व्यक्ति थकान एवं कमजोरी महसूस करता है।

रक्ताल्पता या एनीमिया के प्रकार --(1)हेमोलाइसिस एनीमिया ।

                                                (2)खून की कमी से होनेवाला एनीमिया ।

                                                (3)लाल रक्त की कमी के कारण एनीमिया ।

लक्षण :-थकान,कमजोरी,त्वचा का सफ़ेद या पीलापन दिखना, साँस लेने में परेशानी,चक्कर आना विशेष कर लेटकर एवं बैठकर उठने में,सीने में दर्द,चेहरे एवं पैरों में सूजन दिखाई देना,हाथ -पैरों का ठंडा होना,सरदर्द,नाखूनों एवं पलकों के अंदर सफेदी आदि रक्ताल्पता या एनीमिया के प्रमुख लक्षण हैं।

कारण :-शरीर में रक्त काम होना,बीमारी पीलिया,शुगर,बुखार,खांसी,मलेरिया,कैंसर आदि,रक्त में लौह तत्त्व की कमी,गलत दवाओं का प्रयोग,लिवर का सही तरह काम न करना,पेट में इंफेक्शन,फोलिक एसिड की कमी,आनुवंशिक रूप में बचपन से,मासिक धर्म के कारण अत्यधिक रक्तश्राव,लौह तत्त्व वाली खाद्य पदार्थों का सेवन न करना,बार -बार गर्भ धारण करना आदि रक्ताल्पता या एनीमिया के मुख्य कारण हैं।

उपचार :- (1) मूली,गाजर,टमाटर,शलगम,खीरा,चुकंदर जैसी कच्ची सब्जियां प्रतिदिन खाने से एवं अंकुरित दालों व अनाजों के नियमित 

                   प्रयोग करने से रक्ताल्पता या एनीमिया की बीमारी दूर हो जाती है।

              (2) एक चम्मच तिल का बीज लेकर उसे पानी में भिगों दें और छानकर उसे कूटकर पेस्ट बनाकर उसमें एक चम्मच शहद मिलकर 

                    प्रतिदिन सुबह -शाम सेवन करने से कुछ ही दिनों में रक्ताल्पता या एनीमिया समाप्त हो जाती है।

              (3) एक गिलास सेब का रस लें उसमें एक गिलास चुकंदर का रस और उसमें थोड़ा सा शहद मिलकर प्रतिदिन सुबह -शाम सेवन 

                    करने से रक्ताल्पता या एनीमिया की बीमारी कुछ ही दिनों में नष्ट हो जाती है।

              (4) पके आम के गूदे को मीठे दूध के साथ प्रतिदिन सुबह -शाम सेवन करने से रक्ताल्पता की बीमारी दूर हो जाती है।

              (5) नाश्ते के 30 पहले 30 एम् एल एलोवेरा का जूस प्रतिदिन सुबह -शाम सेवन करने से रक्ताल्पता दूर हो जाती है।

              (6) अंजीर,अंगूर,किशमिश,आलूबुखारा,केले,निम्बू,संतरे,बादाम,सूखे खजूर,मूंगफली,अखरोट आदि फलों का प्रतिदिन सेवन से 

                    रक्ताल्पता या एनीमिया की बीमारी समाप्त  हो जाती है।


high blood pressure

उच्च रक्तचाप रोग :- आज की भागदौड़ से भरी जीवन शैली और अनियमित खान - पान,आहार - विहार,आरामदायक एवं परिश्रम रहित जीवन कई बीमारियों का आश्रय स्थल बन गया है। उनमें उच्च रक्तचाप एक गंभीर बीमारी है,जिसे साइलेंट किलर के नाम से भी जाना जाता है।इस रोग में रक्त वाहिकाओं की झिल्ली पर रक्त का दबाव बढ़ जाने से हृदय को अधिक कार्य करना पड़ता है। तात्पर्य रक्त का दबाव नसों,धमनियों एवं कोशिकाओं द्वारा हृदय तक जाने का समय घट जाता है। एक सामान्य वयस्क मनुष्य का रक्तचाप 120 / 80 mmHg होता है। जब इससे अधिक माप आता है तो उच्च रक्तचाप की स्थिति मानी जाती है। वैसे शारीरिक श्रम करने,व्यायाम करने,चलने - फिरने,शराब पीने,कुछ समय पहले कॉफी पीने के तुरंत बाद मापने पर इसमें अंतर आ जाता है। 

लक्षण :- लगातार सिरदर्द,चक्कर आना,साँस लेने में परेशानी,अधिक क्रोध आना,नाक से खून आना,दोहरी दृष्टि,घबराहट आदि उच्च रक्तचाप के प्रमुख लक्षण हैं। 

कारण : - बढ़ती उम्र,कैफीन का अधिक सेवन,दर्द निवारक दवाओं का प्रयोग,आनुवांशिक,भोजन में नमक की मात्रा अधिक लेना,व्यायाम न करना,धूम्रपान,तनाव,गुर्दे की बीमारी,मधुमेह,कोलेस्ट्रॉल आदि उच्च रक्तचाप के मुख्य कारण हैं। 

उपचार : - (1) भोजन में नमक की मात्रा प्रतिदिन कम लेने से उच्च रक्तचाप का रोग दूर हो जाता है। 

(2) नोनी फल के जूस के प्रतिदिन सुबह - शाम खाली पेट कांच या चीनी मिट्टी के पात्र में 20 मिली लीटर सेवन करने से 100 % उच्च रक्तचाप ठीक हो जाता है। यह निःसंदेह प्रयोग करें क्योंकि यह रामबाण एवं निरापद है। 

(3)दालचीनी पाउडर का प्रयोग एक चौथाई  चम्मच प्रतिदिन सेवन करने से उच्च रक्तचाप ठीक हो जाता है। 

(4) अर्जुन वृक्ष की छाल का काढ़ा प्रतिदिन सेवन करने से उच्च रक्तचाप, कोलेस्ट्रॉल एवं हृदय रोग दूर हो जाता है। 

(5) लहसुन की तीन - चार कलियों को सुबह खाली पेट सेवन करने से उच्च रक्तचाप एवं कोलेस्ट्रॉल ठीक हो जाता है। 

(6) मेथी एवं अजवाइन को रात में पानी में भिगों दें और सुबह सेवन करने से उच्च रक्तचाप दूर हो जाता है। 

(7) त्रिफला 20 ग्राम रत में पानी में भिगों दें और सुबह छानकर एक चम्मच शहद मिलाकर पीने से उच्च रक्तचाप ठीक हो जाता है। 

(8) दूध में आधा या एक चम्मच हल्दी पाउडर एवं एक चौथाई दालचीनी पाउडर मिलाकर पीने से उच्च रक्तचाप दूर हो जाता है। 

 (9) जटामांसी,ब्राह्मी और अश्वगंधा चूर्ण समान भाग मिलाकर एक- एक चम्मच दिन में तीन बार लेने से उच्च रक्तचाप की समस्या से राहत मिलती है ।   

आसान एवं प्राणायाम :- अनुलोम - विलोम,कपालभाति,भस्त्रिका,ताड़ासन,पवन मुक्तासन,शलभासन आदि करने से उच्च रक्तचाप नियंत्रित होकर समाप्त हो जाता है। 


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