otitis media disease

मध्य कर्ण की विद्रधि रोग : - मध्य कर्ण की विद्रधि एक गंभीर रोग है ,जो बहुत कष्टप्रदायक होती है। इसमें मध्य कर्ण के ऊपर छत की पतली हड्डी में सूजन होकर फोड़ा का रूप धारण कर लेती है और पूय न निकल पाने की वजह से कर्णपटह में छेद हो जाती है। पूय का ठीक तरह से न निकल पाने के कारण कान में संक्रमण हो जाता है जो मस्तिष्कावरण में भी शोथ का कारण बन जाती है। यह आमतौर पर दो से छः सप्ताह में अपने आप ठीक हो जाता है। कभी - कभी यह पूय बहुत ज्यादा संक्रमित कर देता है और अत्यंत कष्ट दायक पीड़ा से गुजरना पड़ता है। 

लक्षण :- कान में दर्द,बुखार,कान से पूय निकलना,सुनने में दिक्कत,कान की झिल्ली में सूजन एवं फोड़ा आदि मध्य कर्ण की विद्रधि रोग के प्रमुख लक्षण हैं। 

कारण : - विषाणु जनित संक्रमण,हीमोफिलस इन्फ्लुएंजा,आनुवांशिक कारण,श्वसन तंत्र का संक्रमण आदि मध्य कर्ण की विद्रधि रोग के मुख्य कारण हैं। 

उपचार :- (1) गेंदे के पत्तों का रस कान में डालने से मध्य कर्ण की विद्रधि रोग ठीक हो जाता है। 

(2)नीम के पत्तों का रस कान में डालने से मध्य कर्ण की विद्रधि रोग ठीक हो जाता है। 

(3)गोमूत्र की कुछ बूंदें कान में डालने से मध्य कर्ण की विद्रधि रोग दूर हो जाता है। 

(4) कदम्ब के फूलों का रस कान में डालने से मध्य कर्ण की विद्रधि रोग ठीक हो जाती है। 

(5) अजवाइन के तेल की दो - तीन बूंदें कान में डालने से मध्य कर्ण की विद्रधि रोग ठीक हो जाती है। 

(6) सरसों तेल में लहसुन की कलियाँ जलाकर कान में डालने से मध्य कर्ण की विद्रधि रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाती है। 


ear wax

कान में मैल जमा होना :- कान में मैल जमा होना एक आम समस्या है ,जो बहिकर्ण के चारों ओर की त्वचा एवं श्लैष्मिक कला की ग्रंथियों द्वारा स्रावित पदार्थ कान के सुरंग में जमा होकर सूखने से होता है। इसके अतिरिक्त कान के अंदर मैल मृत चमड़ियों,कान के अंदर टूटे रोयें और कई अन्य चीजों से मिलकर भी बनता है ,जो कान की सुरक्षा में भी सहायक सिद्ध होता है किन्तु अधिकतर ठीक नहीं होकर कई अन्य तरह की बीमारियों को उत्पन्न करने में भी अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है और अन्य कई प्रकार की व्याधियों को जन्म देता है। कान के मैल से कम सुनाई देना,कान में दर्द,सिर में भारीपन आदि के मुख्य कारण होना एक आम बात है ,जो समय के साथ उपचार नहीं करने से इसके गंभीर परिणाम भी सामने आते हैं। इसलिए इसे कभी भी नजरअंदाज नहीं करना कान के अच्छे स्वास्थ्य के लिए ठीक होता है। 

लक्षण :- कान में भारीपन,झनझनाहट,कान में सांय - सांय की आवाज आना,सुनाई कम देना,कान में दर्द,सिरदर्द, सिर में भारीपन आदि कान में मैल जमा होने के प्रमुख लक्षण हैं। 

कारण :- कान के श्लैष्मिक कला द्वारा स्रावित पदार्थ के सूख जाने के कारण,बाहरी धूल कणों ,वातावरणीय प्रदूषण आदि कान में मैल जमा होने के मुख्य कारण हैं। 

उपचार :- (1) साधारण खाने के सोडे को जल में घोलकर गर्म कर हल्का गुनगुना होने पर कान में डालने से कान के मैल ढीली होकर निकल जाता है। 

(2) नमक को गुनगुने पानी में घोलकर कान में डालने से कान के मैल साफ हो जाते हैं। 

(3) सरसों के तेल में लहसुन डालकर गर्म करके और ठंडा होने पर कान में तीन - चार बूंदें डालने से कान का  मैल ढीली होकर निकल जाता  है। 

(4) हाइड्रोजन पर ऑक्साइड कान में डालने से कान के मैल ढीली होकर निकल जाती है। 

(5) पके हुए नीम्बू का रस कान में चार - पांच बूंदें डालने से कान के मैल बहुत आसानी से निकल जाता है। 

(6) कान में दो - तीन बून्द बादाम का तेल डालकर सिर को उसे दिशा में कुछ देर तक रखने से मैल मुलायम होकर निकल जाता है। 


ear abscess disease

कान का फोड़ा या बहिकर्ण विद्रधि रोग :- कान का फोड़ा या बहिकर्ण विद्रधि रोग एक आम बीमारी है,जिसमें छोटी - छोटी सी विद्रधियाँ बनना एवं बड़ी होकर फूटने पर कान से पूय निकलने लगती है। यह अत्यंत पीड़ा देनी वाली स्थिति होती है। साधारणतः लोग इसे कान का बहना नहीं कहते हैं। इस रोग में कान से बहुत बदबू आती है और उस व्यक्ति के पास बैठना अत्यंत कठिन होता है। वास्तव एक साधारण सी बीमारी दिखने वाली कभी - कभी बहुत भयंकर रूप धारण कर लेती है और अत्यंत खतरनाक स्थितियां पैदा हो जाती हैं। इसलिए कान से पूय निकलने को कभी भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और तुरंत चिकित्सक से उपचार करवाना चाहिए। 

लक्षण :- कान में तीव्र पीड़ा,कान से पूय निकलना,कान के अंदर छोटे - छोटे फोड़ा का होना,कान में सूजन ,कान में भारीपन ,सुनने में दिक्कत आदि कान का फोड़ा या बहिकर्ण विद्रधि रोग के प्रमुख लक्षण हैं। 

कारण :- कीटाणुओं का संक्रमण,खून में खराबी,त्वचा कटने एवं खुरचने के कारण,बैक्टीरिया का संक्रमण ,श्वसन संक्रमण आदि कान का फोड़ा या बहिकर्ण विद्रधि रोग के मुख्य कारण हैं। 

उपचार :- (1) नीम की पत्तियों का रस कान में प्रतिदिन सुबह - शाम डालने से बहिकर्ण विद्रधि या कान का फोड़ा रोग ठीक हो जाता है। 

(2) गेंदा के पत्तों का कान में डालने से कान का फोड़ा या बहिकर्ण विद्रधि रोग ठीक हो जाता है। 

(3) अजवाइन के तेल की दो - तीन बूंदें कान में प्रतिदिन डालने से कान का फोड़ा या बहिकर्ण विद्रधि रोग ठीक हो जाता है। 

(4) कदम्ब के फूलों का रस प्रतिदिन कान में डालने से कान का फोड़ा या बहिकर्ण विद्रधि रोग का नाश हो जाता है। 

(5) सरसों के तेल में लहसुन की कलियाँ जलाकर ठंडा कर दो - तीन बूंदें कान में डालने से कान का फोड़ा या बहिकर्ण विद्रधि रोग शीघ्रता से दूर हो जाता है। 

ठीक हो जाता है। 

(6) गोमूत्र की कुछ बूंदें डालने से कान का फोड़ा रोग ठीक हो जाता है। 


turbinate hypertrophy disease

नाक की हड्डी बढ़ने का रोग : - नाक के अंदर हड्डी का बढ़ जाना एक अत्यंत कष्टकारी या कष्टप्रद समस्या है,जो नाक के अंदर वायुमार्ग की सतह में टर्बिनेट नामक एक लम्बी बनावट में वृद्धि के कारण होती है। आम भाषा में इसे नाक की हड्डी बढ़ना कहा जाता जाता है। नाक के अंदर तीन एवं कई लोगों में चार टर्बिनेट पाए जाते हैं। ज्यादातर लोगों में तीन ऊपरी,माध्यम एवं निचले टर्बिनेट होते हैं। जब निचले टर्बिनेट की सूजन ठीक नहीं होती है,इसे ही नाक की हड्डी बढ़ना कहा जाता है। फलस्वरूप साँस लेने में परेशानी एवं खर्राटे लेने जैसी समस्या होती है।

नाक की हड्डी बढ़ने के प्रकार :- 

(1) नेजल साइकल : - इसमें नाक के एक तरफ के टर्बिनेट चार - छः घंटे के लिए सूज जाती है और ठीक होने पर दूसरी तरफ के टर्बिनेट सूजने लगती है। 

(2) क्रोनिक : - लम्बे समय तक टर्बिनेट में इन्फेक्शन या सूजन रहने के कारण लगातार बढ़ता रहता है। 

लक्षण : - साँस लेने में दिक्कत,इन्फेक्शन,नाक से खून आना,मौसमी एलर्जी,नाक के निचले टर्बिनेट में सूजन एवं सिकुड़न,खर्राटे लेना,नाक बहना,चेहरे में हल्का दर्द,घ्राण शक्ति काम होना,नाक बंद होना आदि नाक की हड्डी बढ़ने के रोग के प्रमुख लक्षण हैं। 

कारण : - लम्बे समय तक साइनस की सूजन,मौसम में होने वाली एलर्जी,शरीर के तापमान में परिवर्तन, गर्भावस्था,उम्र बढ़ना,जन्मजात समस्या,सर्दी - जुकाम,धूम्रपान आदि नाक की हड्डी बढ़ने के रोग के मुख्य कारण हैं। 

उपचार :- (1) प्याज के रस की दो - तीन बूंदें प्रतिदिन सुबह - शाम नाक में डालने से साइनस या वायु विवर शोथ रोग ठीक हो जाता है। 

(2) सहजन की फली से रस या सूप निकालें और उसमें अदरक लहसुन,प्याज एवं काली मिर्च डालकर काढ़ा बनाकर पीने से साइनस या वायु विवर शोथ रोग हमेशा के लिए ठीक हो जाती है। 

(3) मेथी के दो चम्मच दाने को पानी में उबालकर प्रतिदिन सुबह - शाम सेवन करने से साइनस की बीमारी ठीक हो जाती है। 

(4) नमक,बेकिंग सौदे का इश्तेमाल नाक की धुलाई में करने से साइनस की बीमारी समाप्त हो जाती है। 

(5) पालक के प्रयोग द्वारा भी साइनस की समस्या समाप्त हो जाती है। 

(6) एक कप पानी में एक चम्मच सेब के सिरके के सेवन से भी साइनस की समस्या ठीक हो जाती है। 

(7) टमाटर एवं लहसुन डालकर सूप बनाकर उसमें काला नमक डालकर पीने से साइनस की समस्या दूर हो जाती है। 

(8) चकोतरा के रस की 10 बूंदों को एक बड़ा कप पानी में मिलाकर प्रतिदिन सुबह - शाम पीने से साइनस की समस्या से निजात मिल जाती है। 

(9) गाय के घी की दो - तीन बूंदें नाक में प्रतिदिन डालने से साइनस या वायु विवर शोथ दूर हो जाता है। 

(10) सरसों तेल की दो - तीन बूंदें नक् में प्रतिदिन डालने से साइनस रोग ठीक हो जाता है। 


sinusitis disease

साइनस या वायु विवर शोथ रोग :- साइनस या वायु विवर शोथ एक अत्यंत गंभीर रोग है जो सर में स्थित वायु विवर या साइनस छिद्रों में गतिरोध उत्पन्न होने के कारण होता है। साइनस का सामान्य कारण जुकाम है ,जिसमें नाक लगातार बहती रहती है। वास्तव में जुकाम एक संक्रामक रोग है और फिर बैक्टीरियल,वायरल या फंगल संक्रमण के साथ उग्र हो जाती है। साथ ही प्रदूषण,ठंडी हवा,धूल,धुंआ आदि के कारण भी साइनस की बीमारी में वृद्धि हो जाती है और अत्यंत कष्ट प्रदान करती है। इसे वायु विवर शोथ रोग के नाम से जाना जाता है। 

लक्षण :- सिरदर्द,बदन दर्द,बुखार एवं बेचैनी,घ्राण शक्ति में कमी,थकान,खांसी,नाक से पानी आना,नाक बंद हो जाना,आँखों के ऊपर दर्द,साँस लेने में तकलीफ,चेहरे की मांसपेशियों में दर्द,गले में दर्द,आवाज में बदलाव आदि साइनस या वायु विवर शोथ रोग के प्रमुख लक्षण हैं। 

कारण :- साइनस या वायु विवर छिद्रों में गतिरोध,बैक्टीरिया एवं फंगल इंफेक्शन,जुकाम होना,अस्थमा,पोषक भोज्य पदार्थों की कमी,प्रदूषण ,धूल धुंआ आदि से युक्त जगहों में अधिक समय तक रहना आदि साइनस या वायु विवर शोध रोग के मुख्य कारण हैं। 

उपचार :- (1) प्याज के रस की दो - तीन बूंदें प्रतिदिन सुबह - शाम नाक में डालने से साइनस या वायु विवर शोथ रोग ठीक हो जाता है। 

(2) सहजन की फली से रस या सूप निकालें और उसमें अदरक लहसुन,प्याज एवं काली मिर्च डालकर काढ़ा बनाकर पीने से साइनस या वायु विवर शोथ रोग हमेशा के लिए ठीक हो जाती है। 

(3) मेथी के दो चम्मच दाने को पानी में उबालकर प्रतिदिन सुबह - शाम सेवन करने से साइनस की बीमारी ठीक हो जाती है। 

(4) नमक,बेकिंग सौदे का इश्तेमाल नाक की धुलाई में करने से साइनस की बीमारी समाप्त हो जाती है। 

(5) पालक के प्रयोग द्वारा भी साइनस की समस्या समाप्त हो जाती है। 

(6) एक कप पानी में एक चम्मच सेब के सिरके के सेवन से भी साइनस की समस्या ठीक हो जाती है। 

(7) टमाटर एवं लहसुन डालकर सूप बनाकर उसमें काला नमक डालकर पीने से साइनस की समस्या दूर हो जाती है। 

(8) चकोतरा के रस की 10 बूंदों को एक बड़ा कप पानी में मिलाकर प्रतिदिन सुबह - शाम पीने से साइनस की समस्या से निजात मिल जाती है। 

(9) गाय के घी की दो - तीन बूंदें नाक में प्रतिदिन डालने से साइनस या वायु विवर शोथ दूर हो जाता है। 

(10) सरसों तेल की दो - तीन बूंदें नक् में प्रतिदिन डालने से साइनस रोग ठीक हो जाता है। 


rhinitis disease

नाक की एलर्जी या नेजल पॉलिप्स रोग :- नाक की एलर्जी या नेजल पॉलिप्स एक सामान्य बीमारी है ,जिसमें नाक के अंदर त्वचा में सूजन हो जाती है और श्वसन मार्गों के अंदरूनी परत का मांस बढ़ने लगता है। इसे नाक का नाकड़ा के नाम से भी जाना जाता है। नाक के अंदर का यह बढ़ा हुआ मांस दर्दरहित एवं कैंसर मुक्त होता है जो नाक के अंदर पानी की बूंद या अंगूरनुमा लटका हुआ रहता है। मांस के बढ़ जाने से साँस लेने में परेशानी, घ्राण शक्ति का ह्रास होना और नाक में बार - बार संक्रमण होने के कारण काफी मुश्किल स्थिति उत्पन्न हो जाना एक आम समस्या है। इसे नाक का बवासीर भी कहा जाता है। 

लक्षण :- सिरदर्द,खर्राटे लेना,ठीक से स्वाद न महसूस करना,बहती नाक,भारीपन,गंध को ठीक से न सूंघ पाना,मुंह से साँस लेना,नाक की त्वचा में सूजन,मांस का बढ़ जाना लालिमा युक्त सूजन,साँस लेने में दिक्कत,बार - बार संक्रमण होना नाक की एलर्जी या नेजल पॉलिप्स रोग के प्रमुख लक्षण हैं। 

कारण :- दमा रोग के कारण रहने वाली सूजन,बार - बार संक्रमण होना,एलर्जी,दवाओं व नशीले पदार्थों के प्रति संवेदनशील होना,प्रतिरक्षा प्रणाली के विकार आदि नाक की एलर्जी या नेजल पॉलिप्स के मुख्य कारण है। 

उपचार :- (1) सूत्रनेति क्रिया द्वारा नाक का मांस बढ़ना रोग समाप्त हो जाता है। 

(2) जलनेति क्रिया द्वारा भी नाक का मांस बढ़ना रोग दूर हो जाता है। 

(3) प्याज के रस की दो - तीन बूंदें प्रतिदिन डालने से नाक का मांस बढ़ना ठीक हो जाता है। 

(4) सेब का सिरका एक चम्मच एक कप पानी में डालकर प्रतिदिन सुबह -शाम सेवन करने से नाक का मांस बढ़ना समाप्त हो जाता है। 

(5) पुदीने के तेल की दो - दो बूंदें प्रतिदिन नाक में डालने से नाक का मांस बढ़ना दूर हो जाता है। 

(6) नीम्बू बाम पानी में डालकर गरारे करने से नाक का मांस बढ़ना ठीक हो जाता है। 

(7) नीलगिरि के तेल की 4 - 5 बूंदें उबलते पानी में डालकर नश्य लेने से भी नाक का मांस बढ़ना दूर हो जाता है। 


adenoids disease

बधिरता रोग :- बधिरता या बहरापन कान की एक आम बीमारी है,जिसमें सुनने की क्षमता आंशिक एवं सम्पूर्ण रूप से समाप्त हो जाती है। बधिरता के कारन मनुष्य का सामाजिक जीवन प्रभावित होकर मानसिक परेशानियों का भी कारण बन जाता है। कान के अंदर मेलियस,इन्कस और स्टेपीज हड्डियों के माध्यम से ध्वनि तरंगें कान के अंदर जाकर मस्तिष्क को सम्प्रेषित होती है। जब इन्हीं तरंगों में अवरोध होता है तो बधिरता या बहरापन की स्थिति होती है। कान की आंतरिक भागों की नसों के कारण अवरोध होने पर बधिरता रोग होता है। वास्तव बधिरता रोग मनुष्य को एक अजीब स्थिति में ला देता है,जिससे वह कुछ सुन पाने में अपने आपको असमर्थ पाता है या कुछ से कुछ आंशिक बातें सुनकर हंसी का पात्र बनाने को विवश हो जाता है।

बधिरता के प्रकार :- (1) कंडक्टिव बहरापन - कान का मैल या फंगस,कान का बहना,पर्दे में छेड़ हो जाना,कान की हड्डी स्टेपीज का छोटा हो जाना,चोट लगना। 

(2) सेन्सरी न्यूरल बहरापन - पैदाइशी बहरापन,ध्वनि प्रदूषण,प्रेशर हॉर्न,तेज जेनेरेटर,अधिक उम्र के कारण। 

लक्षण :- कान में भारीपन,कान में दर्द,चक्कर आना,कान से सांय - सांय के आवाज आना,सुनाई कम देना,सुनाई बिलकुल नहीं देना आदि बधिरता या बहरापन के प्रमुख लक्षण हैं। 

कारण :- बार - बार जुकाम होने,कान का बहना,ज्यादा मैल जमा हो जाना,कान में विद्रधि,खसरा,स्कारलेट ज्वर,टॉन्सिल के शोथ,नासारन्ध्रों में अवरोध,नासागुहा रोग,वायु विवर के रोग,बुढ़ापा,बीमारी के कारण आदि बधिरता या बहरापन रोग के मुख्य कारण हैं। 

उपचार : - (1) दशमूल,अखरोट एवं बादाम के तेल की बूंदें कान में डालने से बधिरता रोग दूर हो जाता है। 

(2) ताजे गोमूत्र में एक चुटकी सेंधा नमक मिलाकर प्रतिदिन एक सप्ताह तक डालने से बधिरता रोग का नाश हो जाता है। 

(3) आकड़े के पके हुए पीले पत्ते को साफ़ कर उस पर सरसों का तेल लगाकर गर्म करके उसका रस निकालकर दो - तीन बून्द प्रतिदिन सुबह - शाम डालने से बधिरता रोग दूर हो जाता है। 

(4) काकजंघा के पत्तों के रस को गर्म करके दो - तीन बून्द डालने से बधिरता या बहरापन रोग दूर हो जाता है। 

(5) जैतून के पत्तों के रस में बराबर की मात्रा शहद मिलाकर गुनगुना कर कान में डालने से बधिरता या बहरापन एक ही महीने में दूर हो जाता है। 

(6) बादाम के तेल में लहसुन की कलियों को डालकर पका लें और छानकर रख ले। इस तेल को कान में डालने से बधिरता या बहरापन रोग दूर हो जाता है। 

(7) अजवाइन के तेल को प्रतिदिन कान में डालने से बधिरता या बहरापन दूर हो जाता है। 

(8) राइ के तेल को गर्म करके दो - तीन बूंदें कान में डालने से बहरापन दूर हो जाता है। 

(9) दूब की घास को घी में डालकर पका लें और दो - तीन बून्द कान में डालने से बधिरता या बहरापन रोग दूर हो जाता है। 


mastoditis disease

कर्णमूल शोथ रोग : - कर्णमूल शोथ कान के निचले हिस्से में स्थित अस्थि में सूजन एवं उसमें फोड़ा बन जाने के कारण होता है। यह रोग कान के मध्य भाग में फोड़ा उत्पन्न होने के कारण ही होता है। जब कर्ण पटह में छेद होकर बनने वाले पूय नहीं निकल पाता है ,तब कान के मध्य भाग से संक्रमण नीचे की ओर हड्डी तक पहुँच जाता है। फलस्वरूप सूजन एवं फोड़ा बन जाने से हड्डी गलने लगती है ,जो अत्यंत कष्टप्रद स्थिति होती है।वास्तव में कर्णमूल शोथ का समय से उपचार नहीं कराने पर गंभीर स्थिति उत्पन्न हो सकती है। अतः इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। 

लक्षण :- कान में दर्द,कान से पूय निकलना,कण से दुर्गन्ध आना,सुनने में कमी आना,कान की झिल्ली में सूजन आ जाना आदि कर्णमूल शोथ के प्रमुख लक्षण हैं। 

कारण :- कान में फोड़ा होना,विषाणुजनित संक्रमण,श्वसन संक्रमण,हीमोफिलस इन्फ्लुएंजा,कान में पानी जाना,कान में गंभीर चोट लगना आदि कर्णमूल शोथ के मुख्य कारण हैं। 

उपचार :- (1) गेंदा के फूलों के पौधे के पत्तों का रस निकाल कर दो -तीन बूंदें डालने से कर्णमूल शोथ दूर हो जाता है। 

(2) कदम्ब के फूलों का रस कण में डालने से कर्णमूल शोथ शीघ्र दूर हो जाता है। 

(3) कान में गोमूत्र डालने से भी कर्णमूल शोथ दूर हो जाता है। 

(4) नीम की पत्तियों का रस कान में डालने से कर्णमूल शोथ दूर हो जाता है। 

(5) बादाम के तेल की दो - तीन बूंदें कान में डालने से कर्णमूल शोथ दूर हो जाता है। 

(6) सरसों के तेल में लहसुन की चार - पांच कलियों को जलाकर छानकर रख लें और कान में दो - तीन बूंदें डालने से कर्णमूल शोथ ठीक हो जाता है। 

(7) अजवाइन के तेल की कुछ बूंदें कण में डालने से कर्णमूल शोथ दूर हो जाता है। 


stuttering disease

तुतलाना या हकलाना रोग :- तुतलाना या हकलाना एक सामान्य वाक् बाधा रोग है ,जिसमें बोलने में वह शब्दों को दुहराता है एवं साथ ही अटक - अटक कर बोलता है। वास्तव में हकलाना या तुतलाना कोई गंभीर बीमारी नहीं है। तुतलाना एक कठिनाई है , जो धारा प्रवाह बोलने में रूकावट पैदा करता है एवं बोलते समय जोर लगाना पड़ता है। यह मानसिक नहीं शारीरिक समस्या है ,जिसे निरंतर अभ्यास एवं आयुर्वेदिक घरेलू नुस्खों के द्वारा दूर किया जा सकता है। तुतलाना या हकलाना ज्यादातर पुरुषों में महिलाओं की अपेक्षा पाया जाता है। हकलाने की समस्या होने पर व्यक्ति दूसरों के सामने बोलने में संकोच करता है और यह सोचता रहता है कि बोलने पर उसका लोग मजाक बनाएंगे। इस कारण से वह लोगों के सामने जाने से भी डरने लगता है। यह उसके जीवन पर गहरा प्रभाव डालता है ,परिणामस्वरुप वह व्यक्ति कुंठित जीवन जीने के लिए मजबूर हो जाता है। 

लक्षण :- रुक -  रुक कर बोलना ,एक ही शब्द को दुहराना ,बोलते समय आँखें बंद का लेना ,ओठ एवं जबड़ों को हिलाना,र को ड़ या ल बोलना ,बोलने में झिझकना ,आवाज में तनाव ,किसी के सामने बोलने में डरना आदि तुतलाना या हकलाना रोग के प्रमुख कारण हैं। 

कारण : - जीभ का नीचे ज्यादा चिपका होना ,नर्व्स की समस्या ,अत्यधिक डर,तनाव या घबराहट,मनोवैज्ञानिक कारण,जीभ का मोटा हो जाना,मस्तिष्क में चोट लगना,ट्यूमर,मस्तिष्क में रक्त का बहाव में बाधा,आनुवांशिक कारण आदि तुतलाना या हकलाना के मुख्य कारण हैं। 

उपचार :- (1) हरे या सूखे आंवला के प्रतिदिन सेवन से तुतलाना या हकलाना ठीक हो जाता है। 

(2) अश्वगंधा तैल की कुछ बूंदें प्रतिदिन नाक में डालने से तुतलाना या हकलाना दूर हो जाता है। 

(3) चार - पांच बादाम को रात में पानी में भिगों दें और उसे पीसकर सुबह एक चम्मच मक्खन के साथ मिलाकर खाने से तुतलाना या हकलाना ठीक हो जाता है। 

(4) एक चम्मच मक्खन में एक चुटकी काली मिर्च का चूर्ण मिलाकर प्रतिदिन सेवन करने से तुतलाना या हकलाना दूर हो जाता है। 

(5) दालचीनी के तैल से जीभ की मालिश से भी तुतलाना या हकलाना ठीक हो जाता है। 

(6) अनु तैल या षडबिंदु तैल के दो - तीन बूंदें नक् में प्रतिदिन डालने से तुतलाना या हकलाना दूर हो जाता है। 

(7) पांच -छह बादाम ,काली मिर्च एवं मिश्री के दानों को पीस लें और मिलाकर सेवन करने से तुतलाना या हकलाना ठीक हो जाता है। 

(8) सूखे खजूर के प्रतिदिन सेवन भी तुतलाना या हकलाना ठीक हो जाता है। 



 


tonsillitis disease

गलगुटिका शोथ या टांसिल रोग :- गलगुटिका शोथ या टांसिल रोग गले की एक आम समस्या है।टांसिल मानव के गले के पिछले हिस्से में स्थित एक प्रकार का ऊतक है ,जो बाहरी रोगाणुओं के आक्रमण से रक्षा करता है।मानव जो खाद्य पदार्थ ,हवा एवं पानी ग्रहण करते हैं ,उसमें उपस्थित किसी प्रकार के जहरीले तत्त्वों से सबसे पहले टांसिल ही प्रभावित होता है।प्रकृति ने मनुष्य के मुख एवं गले की संरचना ही इस प्रकार बनाई है कि उन जहरीले तत्त्वों से हमारे मुँह के आंतरिक तंत्र किसी प्रकार प्रभावित न हों।टांसिल में संक्रमण या सूजन होने पर काफी परेशानी,खाने - पीने में बहुत कष्ट होता है।साथ ही टांसिल में संक्रमण होने की संभावना अधिक होती है।

लक्षण :- बार - बार गला ख़राब होना, गले में सूजन होना , दर्द होना , बार - बार बुखार आना , शरीर में कमजोरी , कान के निचले भाग में दर्द आदि गलगुटिका शोथ या टांसिल रोग के प्रमुख लक्षण हैं।

कारण :- वायरस या बैक्टीरिया का संक्रमण , ठंडी चीज के सेवन करने से , आइसक्रीम खाने से या शीतल पेय पदार्थों के सेवन से, सर्दी - जुकाम , धूम्रपान,शराब के अत्यधिक सेवन आदि गलगुटिका शोथ के मुख्य कारण हैं।

उपचार :- (१)हल्के गुनगुने दूध में हल्दी एवं गोलकी (papper mint) का मिश्रण बनाकर पीने से गलगुटिका शोथ या टांसिल रोग ठीक हो जाता है।

(२) एक गिलास गर्म जल में आधे नीम्बू का रस निचोड़ लें और दो - तीन चम्मच शहद मिलाकर प्रतिदिन सुबह दोपहर शाम पीने से गलगुटिका शोथ या टांसिल रोग दूर हो जाता है।

(3) चुकुन्दर एवं गाजर के जूस का सेवन करने से टांसिल रोग दूर हो जाता है।

(4) बच को पीस कर गले में लेप करने से टांसिल रोग ठीक हो जाता है।

(5 ) बच के जड़ तुलसी के पत्ते और अजवाइन के काढ़ा को पीने से गलगुटिका शोथ या टांसिल रोग ठीक हो जाता है।

(6 ) चित्रक मूल , मुलेठी और तुलसी के पत्ते का काढ़ा पीने से टांसिल रोग दूर हो जाता है।

(7 ) सेब के सिरके को गर्म जल में मिलाकर गरारे करने से टांसिल रोग ठीक हो जाता है।

(8 ) कच्चा पपीता के दूध को जल में मिलाकर गरारे करने से टांसिल रोग ठीक हो जाता है।

(9 ) बेकिंग सोडा को जल में मिलाकर गरारे करने से टांसिल रोग दूर हो जाता है।

(१०) लहसुन की दो -तीन कलियों को जल में आकर उबालें और थोड़ा ठंडा होने पर गरारे करने से टांसिल रोग ठीक हो जाता है।

(11 ) गुनगुने जल में सेंधा नमक एवं हल्दी पाउडर डालकर गरारे करने से गलगुटिका या टांसिल रोग दूर हो जाता है ।


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